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Sunday 7 February 2010

मनुस्मृति-दुस्साहसी की उपेक्षा करने वाले जल्दी नष्ट हो जाते हैं

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 

जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Saturday 6 February 2010

संत कबीर वाणी-चंद्रमा और सूर्य की स्थापना का मुहूर्त किसने निकाला होगा (chandrama,suraj aur muhurt-kabir ke dohe)

धरती अम्बर न हता, को पंडित था पास।

कौन मुहूरत थापिया, चांद सूरज आकाश।।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जब यह धरती और आकाश नहीं था तब यहां कोई पंडित नहीं था। बताओ इनको स्थापित करने का मुहूर्त किसने निकाला होगा?

ब्राह्ण गुरु है जगत का, संतन के गुरु नाहिं

अरुझि परुझि के मरि गये, चारौ बेदों मांहिं।।


ब्राह्म्ण जगत का गुरु हो सकता है पर किसी संत का नहीं।  ज्ञानी ब्राह्म्ण लोग वेदों पर वाद विवाद करते हुए आपस में उलझ कर बिना भक्ति किये ही संसार से विदा हो गय
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य को शायद इसलिये भी स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इसमें अध्यात्मिक ज्ञान तथा हार्दिक भक्ति का महत्व बताते हुए कर्मकांडो से दूर रहने की बात कही गयी।  कबीर, रहीम, मीरा, सूर तथा तुलसीदास जैसे महापुरुषों ने भक्ति भाव को प्रधानता दी पर अंधविश्वासों के नाम पर अपनाये कर्मकांडों का समर्थन कभी नहीं किया-संत कबीर तथा कविवर रहीम ने तो इसका जमकर विरोध किया और मखौल तक उड़ाया।  

आश्चर्य इस बात है कि हमारा समाज के सामान्य लोग अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति तथा हृदय से भक्ति करने को महत्व कम देते हुए कर्मकांडों को ही धर्म समझते हैं।  अनेक लोग अपने पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक तथा मानसिक संकटों के निवारण के लिये तांत्रिकों की मदद लेते हैं जो कि उनमें अज्ञान तथा आत्मविश्वास के अभाव का प्रमाण होता है।
सच बात तो यह है कि वैदिक मंत्रों का प्रभाव तो होता है पर उसे लिये यह जरूरी है कि मनुष्य स्वयं निर्मल भाव से स्वयं उनका जाप करे।  वह भी न करे तो हृदय में केवल भगवान के नाम का स्मरण करे तो भी संकट दूर हो जाते हैं।  शादी तथा दुकान मकान के मुहूर्त के लिये पंडितों के पास जाकर तारीख निकाली जाती है पर क्या कभी किसी ने सोचा है कि जब यह प्रथ्वी, चंद्रमा या सूरज स्थापित हुआ होगा तक किसने मुहूर्त निकाला होगा।
कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तथा भक्ति भाव ही हमारे जीवन की नैया पार लगा सकता है। इस देह के जन्म या मृत्यु को लेकर नाटकबाजी करना बेकार है।  कोई आदमी पैदा होता है तो लोग जश्न मनाते हैं और मरता है तो रोते हैं।  मरने के बाद भी देह का यशोगान करना हमारी परंपरा नहीं है-यानि जन्म तिथि और पुण्यतिथि मनाना भी देहाभिमान का प्रमाण है।  अनेक महापुरुषों ने तेरहवीं और श्राद्धों का भी विरोध किया है।  श्रीमद्भागवत गीता के पहले अध्याय को विषाद योग कहा जाता है जिसमें वीर अर्जुन अपनी चिंताओं से श्रीकृष्ण जी को अवगत कराते हैं-उसमें पितरों के श्राद्ध पर संकट की बात भी कहते हैं।  सीधी बात यह है कि मृत्यु पर शोक करना या तेरहवीं और श्राद्ध करना विषाद को ही जन्म देता है।  अनेक लोग केवल इसलिये ही शोक, श्राद्ध तथा तेरहवीं करते हैं कि न करने पर समाज क्या कहेगा? वह यह सब करते हुए तनाव भी अनुभव करते हैं पर कह नहीं पाते। भगवान श्रीकृष्ण ने बाद के पंद्रह अध्यायों में इसी प्रकार की सकाम भक्ति को अनावश्यक बताया है।  इस तरह के कर्मकांड न केवल धन बल्कि समय भी नष्ट करते हैं और अंततः निजी तनाव का कारण भी इन्हीं से उत्पन्न होता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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