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Monday, March 31, 2008

संत कबीर वाणी:शराब और तमाखू का सेवन करने वालों से दूरी भली

सुरापान अचवन करैं, पिवै तमाखू भंग
कहैं कबीरा राम जन, ताको करो न संग


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि जो लोग शराब और तंबाकु का सेवन करते हैं उनकी तो कभी संगत नहीं करना चाहिए।

राखें बरत एकादसी, करै अन्न को त्याग
भांग तमाखू न तजै, कहैं कबीर अभाग


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग एकादशी पर व्रत में अन्न का त्याग कर देते हैं पर तमाखू का त्याग नहीं कर पाते वह अभागे हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल लोगों में शराब और तमाखू का सेवन बहुत बढ़ गया है। खासतौर से तमाखू का सेवन तो इतना हो गया है कि कई लोग बाजार से पाउच खरीद कर खा लेते और उससे होने वाली बीमारियों को शिकार होते जा रहे हैं। पहले सादा तमाखू का सेवन लोग इतना नहीं करते थे जितना आजकल सजीसजाई पन्नी में बिकते देख करने लगे हैं। इससे लोग शारीरिक और मनोरोग का शिकार हो रहे हैं। कई लड़कों को यह आदत तो केवल इसलिये लग जाती है क्योंकि वह अपने दोस्तों को देखकर स्वयं भी उसे लेने लगते हैं।

पहले सादा तमाखू का उपयोग भी अच्छा नहीं माना जाता था पर जबकि वह आज बिकने वाली तंबाकू से कम हानिकारक थी। आजकल उसमें तमाम रसायन डाले जाते हैं जो और अधिक हानिप्रद होते है। जिस तरह समाज में दुव्र्यसनों को परंपरा के तौर पर अपनाया गया उससे समाज का वातावरण भी विषाक्त हो गया है। उसे देखते हुए तो लगता है कि जो शराब और तमाखू को सेवन करते हैं उनसे दूर ही रहना चाहिए और अपने बच्चों को ऐसे लोगों की संगत नहीं करने देना चाहिए। व्यसन चाहे जो भी हो मनुष्य को शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाता है और जिसके दुष्परिणाम परिवार और समाज को बाद में भोगने पड़ते हैं।

1 comment:

Navin Khanna said...

कबीर दास जी ने अपने दोहों में 'तमाखू ' शब्द प्रयोग किया है .
तम्बाकू पदार्थ अमेरिका की खोज के बाद आया .यानी कबीर दास जी
के जीवन काल के बाद .इसबारे में कृपया प्रकाश डालें .
नवीन खन्ना
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