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Tuesday, April 1, 2008

संत कबीर वाणी:माया वृक्ष की छाया की भांति अस्थिर

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छांहि
बाहर रहै सो ऊबरै, भींजै मन्दिर मांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं तीनों वाली माया रूपी बदली ऐसे ही जैसै वृक्ष की छाया स्थिर नहीं रहती। जो इस माया के जंजाल से परे रहता है। उसी का उद्धार होता है।

सूम सदा ही उद्धरै, दाता जाय नरवक
कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोय जाव सरक्क


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने वीर्य को कंजूसी से व्यय करने वाला तो स्वर्ग में जा सकता है पर जो कामी इसका दान करता है नरक में ही जायेगा। इस साखी को जो लोग सुनकर सरकें नहीं बल्कि विचार करें।

व्याख्या-कबीरदास जी व्यंजना विधा में अपनी बात कहने के सिद्ध थे इसलिये कई जगह उनकी बात का अर्थ समझना पड़ता है और उपरोक्त साखी में कबीरदास जी ने जो बात कही है उसका आशय यही है कि अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण रखकर ही अपना उद्धार हो सकता है।

1 comment:

barb michelen said...

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