शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव
एक शब्द औषधि करे, एक करे घाव
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि अपनी वाणी से शब्द बहुत सोच-समझकर बोलना चाहिए। एक शब्द तो औषधि का काम करता है और एक घाव भी कर सकता है। शब्द को कोई हाथ पाँव नहीं होता कि वह खुद चला आता हो बल्कि उसका बोलना हमारी इच्छा पर निर्भर करता है.
आज के संदर्भ में व्याख्या-अक्सर लोग बोलने के लिए बोलते हैं। आपसी वार्तालाप में अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरे की निंदा करते हैं तो कभी अपने साथ के ही व्यक्ति को अपशब्द बोलते हैं। एक गंदा शब्द हमारी पूरी बात का महत्व भी ख़त्म कर देता है। कुछ लोगों की आदत होती हैं कि वह बात-बात में गाली बकने लगते हैं। सुनने वाले के दिमाग में उस गाली का ऐसा नकारात्मक प्रभाव होता है कि बाकी बात उसके कान के पार जा ही नहीं पाती और उसके दिमाग में गाली ही बसी रहती हैं।
इसी तरह कोई अपना दुख दर्द सुना रहा होता है तो उसका मजाक उडाते हैं। अगर किसी दुखी व्यक्ति को एक शब्द सहानुभूति का कहा जाये तो उसे राहत मिलती है। लोग अपने शब्दों के खजाने का उपयोग सही ढंग से नहीं करते इसलिए आजकल समाज में तनाव बढ़ रहा है। शब्दों में लोगों का मिठास नहीं है। लोग चाहे जो बोलने लगते हैं। अपना दर्द अपने शब्दों में हर कोई बयान कर रहा है पर किसी का दर्द हल्का करने के लिए कोई शब्द व्यय नहीं करना चाहता। ऐसे में अगर लोग अपने शब्दों को सहजता से व्यक्त करें तो इस समाज का दर्द हल्का हो जाये।
Thursday, 13 March, 2008
संत कबीर वाणी:शब्द ही औषधि है और विष भी
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1 comments:
एक अच्छे दोहे के सा्थ बहुत ही सुन्दर विचार प्रेषित किए हैं।
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