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Wednesday, March 5, 2008

संत कबीर वाणी:साधू को मानते नहीं मसखरों देते आदर

कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।

भावार्थ-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।

Thursday, February 28, 2008

संत कबीर वाणी:जीभ के स्वाद पर नियंत्रण जरूरी

खट्टा मीठा चरपरा, जिभ्या सब रस लेय
चोरों कुतिया मिलि गयी, पहरा किसका देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की खट्टा, मीठा, और तीखा सब रसों को स्वाद जिव्हा लेती हैं फिर जब कुतिया चोरों से मिल गयी तो पहरा कौन देगा. अगर स्वाद के साथ अन्य विषय भी जुड़ गए तो आदमी का मन पर नियंत्रण कहाँ रह सकता है.


आहार करें मन भावता, जिभ्या केरे स्वाद
नाक तलक पूरन भरे, क्यों कहिये वे साध


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जिव्हा के स्वाद के चक्कर में पड़कर जो मन को अच्छे लगाने वाले आहार की खोज में जुटा रहता है उसे साधू नहीं कहा जा सकता है.

Sunday, January 6, 2008

रहीम के दोहे:कलारी वाले के हाथ में दूध भी मदिरा लगता है

रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि
दूध कलारी कर गाहे, मद समुझै सब ताहि


कविवर रहीम का कथन है कि नीच व्यक्ति के संपर्क में रहने से सबको कलंक ही लगता है। मद्य बेचने वाले व्यक्ति के हाथ में दूध होने पर भी लोग उसे मदिरा ही समझते हैं।

रहिमन निज संपत्ति बिना, कोउ न विपति सहाय
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय


कविवर रहीम कहते हैं कि अपने धन के अतिरिक्त आपत्ति आने पर अन्य कोई सहायता नहीं करता जैसे बिना जल के कमल के मुरझाने पर सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर पाता।

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