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Sunday, January 25, 2009

कबीर के दोहे: सेवा की मांगते हैं चौगुनी कीमत

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम
कहैं कबीर सेवक नहीं, कहैं चौगुना दाम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य अपने मन में इच्छा को रखकर निज स्वार्थ से सेवा करता है वह सेवक नही क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है। यह कीमत भी चौगुना होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमने देखा होगा कई लोग समाज की सेवा का दावा करते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य केवल आत्मप्रचार करना होता है। कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होने अपने नाम से सेवा संस्थान बना लिए है और दानी लोगों से चन्दा लेकर तथाकथित रूप से समाज सेवा करते हैं और मीडिया में अपनी ‘समाजसेवी’की छबि का प्रचार करते हैं ऐसे लोगों को समाज सेवक तो माना ही नहीं जा सकता। इसके अलावा कई धनी लोगों ने अपने नाम से दान संस्थाए बना रखी हैं और वह उसमें पैसा भी देते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य करों से बचना होता है या अपना प्रचार करना-उन्हें भी इसी श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि वह अपनी समाज सेवा का विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
कुल मिलाकर समाजसेवा आजकल एक व्यापार की तरह हो गयी है। सच्चा सेव तो उसे माना जाता है जो बिना प्रचार के निष्काम भाव से सच्ची सेवा करते हैं। अपने भले काम का प्रचार करने का आशय यही है कि कोई आदमी उसका प्रचार कर फायदा उठाना चाहता है। कई बार ऐसा भी होता है कि हम जब कोई भला काम कर रहे होते हैं तो यह भावना मन में आती है कि कोई ऐसा करते हुए हमें देखें तो इसका आशय यह है कि हम निष्काम नहीं हैं-यह बात हमें समझ लेना चाहिये। जब हम कोई भला काम करें तो यह ‘हमारा कर्तव्य है’ ऐसा विचार करते हुए करना चाहिये। उसके लिये प्रशंसा मिले यह कभी नहीं सोचें तो अच्छा है। इससे एक तो प्रशंसा न मिलने पर निराशा नहीं होगी और काम भी अच्छा होगा।
संत कबीर संदेशः फल की चाहा में मन से काम नहीं होता
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Wednesday, December 31, 2008

रहीम संदेश: काम निकाल कर मुहँ फेरना नीच लोगों का स्वभाव

रहिमन धरिया रहंट की, त्यों ओछे की डीठ
रीतेहि सन्मुख होत है, भरी दिखावै पीठ


कविवर रहीम कहते हैं कि नीच आदमी की प्रवृत्ति रहंट की घडि़या की तरह होती है जब पानी भरना होता है तो वह उसके आगे अपना सिर झुकाती है और जब जब भर जाता है तो उससे मूंह फेर लेती है। ऐसे ही नीच आदमी जब किसी में काम पड़ता है तो उसके आगे सिर झुकाता है और कम करते ही मूंह फेर लेता है।

रहिमन खोटि आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भरवै, कज्जल वमन कराय


कविवर रहीम कहते हैं कि अगर किसी काम का आरंभ जैसे होता है वैसे ही उसके अनुसार परिणाम पर उसका अंत होता है। जैसे दीपक अपने प्रज्जवलित होते ही ऊपर के अंधेरे को अंदर भरता है और रोशनी करने के बावजूद उसके तल में अंधेरा ही रहता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अपना काम निकाल कर मूंह फेरना नीच लोगों की प्रवृत्ति है। अपना आत्ममंथन कर देखना चाहिये कि यह प्रवृत्ति कहीं हमारे अंदर भी तो नहीं है। वैसे आजकल चाटुकारिता और चमचागिरी का समय है। जब तक कोई आदमी धनी,प्रतिष्ठित और बड़े ओहदे पर है उसके आगे चाटुकारों का जमावड़ा होता है जैसे ही वह पतन की ओर अग्रसर होता हैं वैसे ही सभी साथ छोड़ जाते हैं। आदमी की यह प्रवृित्त चूहों की तरह ही है जो डूबते जहाज को सबसे पहले छोड़कर भागते हैं।

किसी भी काम को बिना सोचे समझे प्रारंभ नहीं करना चाहिये क्योंकि जिस काम की जैसी शुरुआत होती है वैसे ही उसका अंत भी होता है। किसी अभियान या लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये उसका अध्ययन कर लेना चाहिये और फिर अपने साधन और सहयोगियों को चयन करें। उतावली से शुरु किये गये काम का परिणाम भी निराशाजनक होता हैं। इसके अलावा अपने अंदर यह अहंकार भी नहीं पालना चाहिये कि ‘मुझे सभी कुछ आता है’। जहां सीखने का अवसर मिले वह दिल लगाना चाहिये। यह जीवन बहुत लंबा और संघर्षमय होता है पता नहीं कब किस ज्ञान या सीख की हमें आवश्यकता पड़ जाये।
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