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Sunday 6 February 2011

सफलता और लोकप्रियता के लिये जनविरोधी काम न करें-हिन्दी धार्मिक चिंतन (succes and publicity-hindi dharmik chittan)

आज समाज में नाम पाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की मनोवृत्ति बढ़ती जा रही है।  प्रचार माध्यमों में नाम पाने का मोह लोगों को अंधा बना देता है। अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का नायक की तरह प्रचार देखकर कुछ युवा भ्रमित हो जाते हैं।  वैसे भी जनसामान्य को लगता है कि जो लोग अपनी हिंसक अपराधिक प्रवृत्ति की वजह से समाज में डर बनाये रहते हैं वह कोई दमदार आदमी हैं।  उनका रुतवा देखकर सब उनसे संपर्क रखते हैं पर प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा।  जो लोग जनविरोधी काम करते हुए आतंक का वातावरण बनाते हैं वह दरअसल स्वयं ही अंदर से डरे रहते हैं। उनकी बदनामी को लोकप्रियता समझना मूर्खता है।  समाज में सम्मान तो केवल उसी आदमी को मिलता है जो जनहित का काम करता है। 
हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि 
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आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
"भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।"
श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
"उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।"
हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Saturday 5 February 2011

संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों की कमी नहीं है-हिन्दी चिंत्तन आलेख

जैसे जैसे मनुष्य का अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसे इस संसार के भोग विलास की वास्तविकता समझ में आती है। उपभोग की प्रवृत्ति किस तरह मनुष्य को पशु बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस संसार में बांधे रहती है इसका आभास तत्वज्ञानी को हो जाता है। ‘दिल मांगे मोर’ का नारा बाज़ार में प्रचार के माध्यम से इसलिये उछाला जाता है कि लोग विज्ञापित वस्तु का क्रय करने के लिये लालायित हों।
समाज में बाज़ार तथा उसके परचार माध्यमों से उपभोग कि प्रवृति बढ़ाई जा रही है रोज देखा जा सकता है।
  एक विज्ञापन में तो भारतीय फिल्मों का एक अभिनेता साफ कहता है कि ‘आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। जो लोग संतुष्ट होते हैं वह जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते।’
कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की लालच का कोई अंत नहीं है। अक्सर समाचारों में यह चर्चा आती है कि भारत के उच्च वर्ग का बहुत सारा काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। यह उच्च वर्ग ऐसा है जो यहां भारत में रहकर आदर्शवाद, नैतिकतावाद तथा कल्याण वाद की राह पर चलने का दावा करते हुए समाज पर नियंत्रण रखता है मगर उसकी पैसे की हवस मिटती नहीं। अनेक राजकीय अधिकारी पकड़े गये हैं जिन्होंने इतना धन अर्जित किया कि उनकी आगे की दस पीढ़ियां भी नहीं खा सकती। इतने सारे आवास बना लिये कि उनकी पचास पीढ़ियों के वंशज भी उसमें रह जायें तो कम लगें। यह केवल उच्च वर्ग ही नहीं सामान्य वर्ग पर भी लागू है। लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुझान ही नहीं रहा। समाज में भौतिकवाद का इतना बोलाबाला है कि अगर तत्वज्ञानी उनमें बैठकर ज्ञानचर्चा करे तो उसे पागल समझा जाता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह सांसरिक विषय में चर्चा करने में रुचि नहीं लेते तो उनको अज्ञानी मान लिया जाता है।
पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
ऐसे में ज्ञानियों के लिये मौन ही अच्छा है। अपने नियमित कर्मं करने के साथ ही ज्ञानियों के लिये यह भी जरूरी है कि वह भौतिकवादी लोगों के बाहुल्य वाले समाज में अर्थ, प्रतिष्ठा या उच्च पद के अभाव में सम्मान या इनाम की आशा न करें। वह तो दृष्टा की तरह इस संसार को देखें और अपना काम करते जायें।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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