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Sunday 4 December 2011

संत दरिया के दोहे-बगुला और हंस का रंग एक पर प्रकृति अलग है (sant dariya ke dohe-bagula aur hans)

               वर्तमान युग भौतिकतावाद के चरम पर पहुंच गया है। धन संचय, संपदा सृजन और वस्तुओं के संग्रह के साथ ही आमजनों में अपने लिये सुविधाऐं पाने की अंधी दौड़ लगी हुई है। आदमी अपने हृदय में व्याप्त अंधेरे से भागता हुआ बाहर रौशनी ढूंढ रहा है। अज्ञानी लोग अपने मन के वश सांसरिक उपलब्धियों को पचा नहीं पा रहे। आदमी एक वस्तु पाने का लक्ष्य प्राप्त करता है तब भी उसकी बेचैनी खत्म नहीं होती। उससे जल्दी बोर हो जाता है फिर दूसरी के लिये भागता है। भक्ति, योग साधना और परमात्मा के नाम जाप को वृद्धावस्था की विषय समझा जाता है। परिणाम यह है कि समाज में तनाव और वैमनस्य बढ़ रहा है। तत्वज्ञान से परे होकर समाज ऐसा सुख ढूंढ रहा है जिसकी प्राप्ति संभव नहीं है।
संत दरिया कहते हैं कि
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बाट खुली जब जानिये, अंतर भया उजास।
जो कुछ थी सो ही बनीं, पूरी मन की आस।
‘‘हृदय में उजाला हो तभी मार्ग को खुला समझें। उसके बाद जब तत्वज्ञान होने पर संतोष का भाव आने से मनुष्य अपनी आवश्यकतायें और आशाऐं सीमित कर लेता है। इसलिये मन की सभी आशायें स्वतः पूरी हो जाती है।’’
‘‘दरिया’ बगुला ऊजला, उज्जवल ही होय हंस।
वे सरवर मोती चुगैं, वा के मुख में मंस।।
बगुला और हंस दोनों का रंग सफेद होता है परंतु प्रकृति दोनों की अलग है। हंस मोती खाता है जबकि बगुला मांस खाकर भूख मिटाता है।
              दौलत, शौहरत और बड़ा ओहदा पाने की होड़ ने मनुष्य को पशु से भी बदतर बना दिया है। कहने को सभी मनुष्य एक जैसे होते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर उसके व्यवहार से दिखता है। ज्ञानी मनुष्य अपनी सीमित आवश्यकाओं के कारण शांति से रहते हैं। समय मिलने पर सत्संग और परमात्मा के गुणों की चर्चा कर मन का सुख प्राप्त करने की कला उनको आती है। जबकि अज्ञानी मनुष्य पूरी जिंदगी भौतिक उपलब्धि प्राप्त करते हुए गुजारता है और समय मिलने पर उनका उनके बखान में बबार्द करता है। कहने को हमारे देश में शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ी है पर ज्ञानी तो नगण्य ही है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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