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Friday, August 7, 2009

भर्तृहरि शतक-कोई कोई ही योगी होता है (rogi aur yogi-hindi dharm sandesh)

भिक्षाशी जनमध्यसंरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा दानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तयस्वी स्थितः।
रथ्याकीर्णविशीर्णजीर्णवसनः सम्प्राप्तकंथासनो निर्मानो निरहंकृतिः शमसुखाभोगैकबद्धस्पृहः।।
हिंदी में भावार्थ-
भीख मांगने वाले, लोगों की भीड़ में अकेले रहने वाले, सदा स्वतंत्र रहने वाले, सदा दान और धर्म में रहने वाले, सामान्य व्यवहार में व्यवसायिकता न दिखाते हुए मान अपमान से परे जीर्णशीर्ण आसन पर बैठने वाले और अहंकार से रहित कोई कोई सच्चे योगी ही इस संसार में होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-धर्म के नाम पर पाखंड करने वाले लोगों की संख्या कभी इस देश में कभी कम नहीं रही-कम से कम भर्तृहरि महाराज के इस कथन से तो यही लगता है। यह भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी खूबी है कि वह सत्य का पहचानता है और मानसिक दृष्टि में उसकी चमक स्वाभाविक रूप से दिखती है। सत्य यह है कि इस सृष्टि और जीवन के मूलतत्व के गुण ही उसके संचालन में सहायक होते हैं। आदमी को चलाता मन है और उसे लगता है कि वह स्वयं चल रहा है। चतुर और व्यवसायिक प्रवृत्ति के लोग दूसरों के इसी मन को वश करने के उपाय करते हैं। एक तो वह लोग हैं जो मनोरंजन के नाम पर यह काम ईमानदारी से करते हैं पर दूसरे वह भी हैं जो मन को शांति दिलाने के नाम पर भारतीय अध्यात्म के चमकदार सूत्र नारों की तरह सुनाकर उनकी अध्यात्मिक भूख को शांत करने का व्यापार करते हैं। यह भी एक तरह का मनोरंजन है पर इससे वह अध्यात्मिक शांति नहीं मिलती जिसकी आदमी अपेक्षा करता है। कुछ देर प्रवचन सुने फिर उसी हालत में मन पहुंच गया तो क्या लाभ? अध्यात्मिक शांति और लाभ तो तभी हो सकता है जब मन में भटकाव कभी न आये। आदमी सांसरिक कर्तव्य में संलग्न रहे पर उसका भाव उसमें लिप्त न हो।
मगर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान बेचने वाले कथित व्यापारी स्वयं ही भोगों के रोगों का शिकार रहते हैं तो वह दूसरे को क्या उबारेंगे?

ऐसा तो कोई कोई योगी होता है जो मान अपमान से परे होकर किसी प्रकार की लाभ की आशा न करते हुए रह सकता है। बाकी दिखावा करने वाले बहुत हैं। सन्यास लेने के लिये आदमी एकाकी स्थान पर जाता है और पर आजकल के फाईव स्टार आश्रम बनाते हैं।
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Saturday, August 1, 2009

चाणक्य नीतिः विदेश में विद्या और देश में स्त्री होती है सच्ची मित्र (chankya niti-nari aur vidya hoti hai dost

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि विदेश में विद्या और घर में स्त्री ही पुरुष की मित्र होती है। बीमार आदमी के लिये औषधि और मृतक का मित्र उसका धर्म होता है।
तृपां ब्रह्मविदः स्वर्गतुणं शूरस्य जीवितम्।
जिताऽशस्य तृणं नारी निःस्मृहस्य तृणं जगत्।।
हिंदी में भावार्थ-
ब्रह्मज्ञानी के लिए स्वर्ग एक तिनके, शूरवीर के लिये जीवन, संयमी के लिये नारी, और कामनाओं से रहित मनुष्य के लिये संसार तिनके समान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रता को लेकर अनेक तरह के लोग भ्रम पालते हैं जबकि सच यह है कि अपने पास जो ज्ञान, अनुभव और आधुनिक शिक्षा है वह विदेश में मित्रता निभाती है। कुछ लोग अपने पास ज्ञान, शिक्षा और कार्य के अनुभव न होने पर भी दूसरों के कहने पर अपना शहर या देश छोड़ देते हैं जिससे उनको बाद में धोखा मिलता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिसमें विदेश जाने के इच्छुक लोगों ने अपना घर छोड़ा पर बाहर जाकर उनको भारी तकलीफ झेलनी पड़ी। उसी तरह अपने ही शहर या देश में अपने साथ काम करने वाले सहकर्मी या व्यसनी साथियों को लोग अपना मित्र समझ लेते हैं जबकि सच यह है कि घर की स्त्री ही पुरुष की सबसे सच्ची मित्र होती है। भले ही घर की स्वामिनी अपनी वाणी से कभी इस बात को नहीं जताती मगर पुरुष के लिये अपने देश और शहर में सच्चे मित्र की भूमिका उससे बेहतर कोई नहीं निभा सकता। उसकी उपेक्षा कर दूसरों की सलाह पर काम करने वाला कभी भी जीवन में सफल नहीं होता। विवाह से पूर्व पुरुष के साथ माता और बहिन मित्र की भूमिका निभाती है तो विवाह बाद उसकी पत्नी यही दायित्व उठाती है। जो लोग अपनी स्त्री पर विश्वास नहीं करते उनके लिये जीवन हमेशा कष्टप्रद हो जाता है।

कर्मकांड का निर्वाह कर स्वर्ग पाने का विचार एकदम भ्रम है। भारतीय अध्यात्म को छोड़कर अन्य विचारधारायें मनुष्य को स्वर्ग पहुंचाकर वहां सुख पाने का भ्रम दिखाती हैं। स्वर्ग नाम की चीज इस सृष्टि में है ही नहीं। तत्वज्ञानी इस बात को जानते हैं। अगर मनुष्य जीवन में योग साधना, नियम और संयम से कार्य करे तो वह इसी देह के साथ ही यहां इस धरती पर स्वर्ग भोग सकता है वरना तो उसके लिये भटकाव के अलावा और कुछ नहीं है। अगर कहीं स्वर्ग भी है तो वह अपनी अनुशासनीनता, लालच और लोभ की प्रवृत्तियों के कारण वह आनंद नहीं उठा सकता। वहां भी वह इस बात पर विचलित होगा कि दूसरे लोग स्वर्ग क्यों भोग रहे हैं?
दैहिक सुख हमेशा इंद्रियों से भोगा जाता है और इसके नष्ट होने के बाद भोग और रोग की अनुभूति समाप्त हो जाती है और साथ में सुख और योग का भी नाम तक नहीं रहता। इसलिये इसी देह से जितना हो सके मनुष्य भगवान भक्ति कर जीवन सुधार ले यही एक बेहतर तरीका है।
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