
पता नहीं धर्म को लेकर मेरे दिमाग में संशय है या मेरा ज्ञान ही अल्प है। मैं आज तक धर्म और अध्यात्म में भेद नहीं समझ पाया-और कभी कोशिश भी की तो उलझकर रह जाता हूँ । अगर हम अपने मन और मस्तिष्क को स्थिर कर जीवन को भरपूर ढंग से जीना चाहते हैं तो मेरे विचार से हमारे लिए अध्यात्म का ज्ञान ही पर्याप्त है जबकि हम अपने स्थित मन के अहंकार के अवगुण के कारण अपने आपको अन्य लोगों से श्रेष्ठ साबित करना चाहते है तो धर्म की नाम पर तमाम कर्मकांड अपनाकर ऐसा प्रयास करते है।
भारत को विश्व का आध्यात्म गुरू कहा जाता है पर लोग अपने धार्मिक कर्मकांड को ही आध्यात्म समझ लेते है और उनको संपन्न करने तक ही सीमित रहते हैं। इसके बाद भी यदि व्यक्ति की व्यक्ति पर परिवार की समाज पर और एक समाज की दुसरे समाज पर श्रेष्ठता प्रमाणित न हो तो शोरशराबे से और उससे भी प्रमाणित न हो तो हिंसक प्रदर्शन से प्रमाणित कराने का प्रयास किया जाता है। जितनी शांति की बात इस देश में की जाती है उतनी ही अशांति यहां फैलती है। आजकल पंजाब में जो बवाल मचा है उस पर मुझे हैरानी हो रही है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि माजरा क्या है? ऐसा लगता है कुछ राजनीति तो कुछ लोगों के निहित स्वार्थ ऐसे संघर्षों से ही सिध्द होते हैं । इस पूरे मसले पर अपनी राय कायम करने से पहले मैं अपने मन को टटोल रहा हूँ और पा ता हूँ कि सिख गुरुओं के प्रति मेरे मन में अपार श्रध्दा भरी हुई है और भगवान् गुरू नानक देव मेरे ह्रदय पटल पर जिस तरह स्थित हैं उसको व्यक्त करने के लिए यह लेख छोटा पड जाएगा और मैं अपनी मूल बात से हट जाऊंगा। वैसे भी पानी श्रध्दा अपने मन में रखनी चाहिए। जब मैं छोटा था और बीमार पड़ता तब तब मेरी नानी गुरुद्वारे के लिए पांच या दस रूपये का कराह(एक तरह का प्रसाद ) की मनौती मानती थी। जब मैं ठीक हो जाता तो वह लेकर मुझे खिलाती थी। मेरी माताजी श्री गीता पढ़ती थी और नानी मुझे गुरूद्वारे मत्था टेकने ले जाती। आज भी जब मैं किसी गुरुद्वारे जाता हूँ तो उनकी बहुत याद आती है। । मेरी नानी ने अपने एक पुत्र की कामना में उसे सिख बनाने की मनौती मानी थी और वह आज एक सिख हैं और हनुमान चालीसा उन्हें कंठस्थ है। मतलब यह कि गुरुद्वारा और मंदिर में आस्था का जो प्रश्न है उसके मेरे पास तो कोई ऐसा पैमाना नहीं है नाप सकूं कि किस्में कम है और किस्में ज्यादा । हाँ, इतना जरूर कह सकता हूँ कि मुझे दोनों जगह सहजता के भाव का अनुभव एक जैसा रहता है। गुरुनानक देव के जीवन चरित्र के बारे में सब जानते हैं । एक व्यापारी परिवार मैं पैदा हुए और समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों के विरूध्द समाज में जाग्रति लाने का प्रयास किया। उन्होने निराकार और निरंकार परमात्मा के उपासना के प्रेरणा दीं थी। उनकी मान्यताओं को मानने वाले बड़ी संख्या में हैं और जरूरी नहीं कि सभी सिख धर्म की रीतियों और रिवाजों को अपनाते हौं ।
देश में राजनीतिक दाव्पेंचों के चलते तमाम तरह के भेद स्थापित किये गये हैं जिसमें एक यह भी कि सिख धर्म और हिंद्दू धर्म अलग-अलग हैं। मुझे इस पर भी कोई टिप्पणी नहीं करनी पर इस समय जिस तरह देश में विभिन्न धर्मों के नाम पर संघर्ष भड़काये जा रहे है उससे निराशा होती है। बताया जा रहा है किसी ने सिख गुरुओं पर प्रतिकूल टिप्पणी की जिस पर सिख समुदाय में नाराजगी है और इसे इस तरह रंग दिया गया कि पंजाब के बाहर भी प्रदर्शन हो रहे हैं । जिसने सिख गुरुओं पर टिप्पणियां की है न तो मैं उनके बारे में जानता हूँ न ही मुझे पता ही है कि कैसी बाते उन्होंने की हैं। एक खबर में सिख गुरुओं पर टिप्पणी की बात है तो दूसरी में किसी विज्ञापन पर चर्चा है पर उनके विरूध्द प्रदर्शन कर रहे लोगों के विचारों से ही पता लगा कि किसी ने टिप्पणियां की हैं या कोई विज्ञापन दिया है। मतलब यह कि अगर प्रदर्शन नही होते तो ऎसी टिप्पणियाँ या विज्ञापन कराने वाले और उनके कारनामे कहीं अँधेरे कोने में पडे होते , और कोई उन्हें घास भी नहीं डालता पर ऎसी हालत में धर्म के नाम पर बवाल मचाने वालों के हित थोड़े ही सधते । ऐसा लगता है सिख्गुरुओं के प्रति प्रतिकूल टिप्पणियां या विज्ञापन और प्रदर्शन दोनों ही किसी योजना का ही हिस्सा है वरना इस देश में कौन है जो ऎसी टिप्पणियां करेगा। इस देश में सिख गुरुओं का सम्मान हिंदू और सिख समान रुप से करते हैं फिर इस तरह का बवाल मचना अपने आप में आश्चर्य के बात है , केंद्र और सरकारों को मिलकर इस बात के जांच करना चाहिए कि कौन लोग इस देश में अशांति फैलाना चाहते हैं? सिख गुरुओं के उपदेशों की प्रमाणिकता निर्विवाद है और कोई उन्हें चुनौती दे रहा है तो यह केवल सिख धर्म का मामला नहीं है बल्कि कोई राजनीतिक चाल भी हो सकती है और उसे हमारे विरोधी राष्ट्रों का समर्थन भी प्राप्त हो सकता है। ऐसे में हर नागरिक- चाहे वह सिख हो या हिंदू उसे सतर्क होना चाहिय और इस तरह की घटनाओं से निपटने का कम सरकार पर छोड़ना चाहिए न कि समाज में आग भड़काने का कम करना चाहिए । सिख हमारे समाज का एक अटूट अंग हैं और उनके धार्निक भावनाओं का सम्मान होना चाहिए पर उन्हें भड़काया भी नहीं जाना चाहिए।
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Wednesday 16 May 2007
धर्म के नाम पर फिर बवाल मचने का प्रयास
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3 comments:
ठीक कहते है भाई पर करे तो क्या ये भि तो बताईये
जिस बात पर आप दुखी है, हम भी उसी बात पर दुखी है.
जहाँ तक मेरा अपना निजि विचार है कि इस तरह की सिक्खों के विरूद्द साजिश बहुत पहले से की जा रही हैं। कहीं उन की पगड़ी को लेकर, तो कही उन के धार्मिक चिन्हों को लेकर।अब जो हुआ पंजाब में उस मे एक राजनैतिक पार्टी का नाम सामने आ रहा है।राम रहीम सिहँ नाम के गुरू(डेरा सच्चा सोदा) का संम्बंध इस घट्ना से है ,ऎसा कहा जा रहा है।यह तो जाँच का विषय है। लेकिन लगता है आज यदि आप को अपनी पब्लीसिटि करवानी है तो किसी के धर्म या पंथ के बारे में ऊट-पटांग बोल दो। तो यह काम आसानी से हो जाता है।शायद यह भी एक कारण हो सकता है इस के पीछॆ।
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