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हिंदी मित्र पत्रिका

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Friday, November 6, 2009

संत कबीर वाणीः दौलत की वजह से सभी प्यार करते हैं (kabir ke dohe-daulat aur pyar)

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्साहित करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि सच्चा प्रेम केवल परमात्मा से किया जा सकता है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, November 5, 2009

मनु स्मृति-लालची और बुद्धिहीन स्वामी सजा नहीं दे पाता

सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। से प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। समाज के शीर्षस्थ वर्ग का यह दायित्व है कि वह छोटे वर्ग की रक्षा करे।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, November 3, 2009

विदुर नीति-तीन दोष मनुष्य का नाश कर देते हैं (teen dosh manushya ke shatru)

द्वाविमौ पुरुषौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः।
प्रभुश्चक्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।।
हिंदी में भावार्थ-
शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने तथा दरिद्र होने पर भी दान करने वाला मनुष्य स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाता है।

हरणं च परम्वानां परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदश्चय परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षमावहा।।
हिंदी में भावार्थ-
दूसरे के धन को हरना, परायी स्त्री से संपर्क रखना तथा सहृदय मित्र का त्याग-यह तीन दोष आदमी का नाश कर देते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल सबसे बड़ी समस्या यह है कि आदमी अपने गुण दोषों पर ध्यान नहीं देता। दूसरे के हक मारने से लोग तब रुकें जब उनके पास इतनी चिंतन क्षमता हो कि वह अच्छाई बुराई का निर्णय कर सकें। सभी को अपने स्वार्थ का भान है दूसरे के अधिकार पर कौन ध्यान देता है? हमने कई बार सुना होगा कि किसी ने अनुसंधान से कोई अविष्कार किया तो किसी दूसरे ने अपने नाम से उसे प्रचारित किया। उसी तरह अनेक लोग दूसरों की मौलिक रचनायें अपने नाम से छापकर गर्व महसूस करते हैं। कई लोग दूसरे के परिश्रम के रूप में देय मूल्य से मूंह फेरे जाते हैं या फिर कम देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे का अधिकार मारने में कोई नहीं झिझकता। यह कोई नहीं समझता कि इसका परिणाम कहीं न कहीं भोगना पड़ता है।
मनुष्य की शक्ति की पहचान उसकी सहनशीलता में है न कि हिंसा का प्रदर्शन करने में। जिसमें शारीरिक शक्ति और मानसिक दृढ़ता की कमी होती है वह बहुत जल्द हिंसक हो उठते हैं। जिन लोगों के पास शक्ति और धीरज है वह क्षमा करने में अधिक विश्वास करते हैं। उसी तरह आजकल धनलोलुपों का हाल है। सभी धन के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। दिखाने के लिये वह धन का दान भले ही करते हों पर उनके लिये पुण्य कमाना दुर्लभ है क्योंकि उनका धन उचित मार्गों से नहीं अर्जित किया गया। सच तो यह है कि जो मिलबांटकर खाते हैं उनको ही पुण्य मिलता है। जो दरिद्र है वह जब दान करता है तो उसका स्थान स्वर्ग से भी ऊंचा हो जाता है।
संकलक एवं  व्याख्याकार-दीपक भारतदीप 
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, Gwlior
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Sunday, November 1, 2009

चाणक्य नीति-स्नेह करना दु:ख का मूल कारण (sneh dukh ka karan-chankya niti in hindi

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। जिसने स्नेह को त्याग दिया वही सुखी रहता है।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस जीवन में सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई और दया बहिन समान है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान जीवन के सत्य को प्रवाहित करने वाला स्त्रोत है जिसमें आत्मा को सर्वोपरि बताया गया है। समूचे जीवों से प्रेम करना धर्म है और कमजोर और निरीह पर दया करना सबसे बड़ा पुण्य है। मगर अनेक कथित साधु संतों समाज में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये मनुष्य को रिश्तों में बंधे रहकर केवल उनके निर्वाह के लिये प्रेरित करते है ताकि उनकी छबि समाज सुधारक के रूप में बनी रहे।
नीति विशारद चाणक्य स्पष्ट कहते हैं कि सत्य ही माता के समान है और ज्ञान ही पिता तुल्य है। भाई के समान धर्म और बहिन के समान दया है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है। अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने रिश्तों के साथ निर्वाह करना ठीक है पर उनके प्रति अधिक मोह पालना ठीक नहीं है। यह मोह न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुंचाता है बल्कि सांसरिक गतिविधियों में इस तरह लिप्त करता है कि उससे मन और देह में केवल विकार और अशांति ही पैदा होती है। तथाकथित विद्वानों और संतों ने ऐसे अनेक कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया है जो केवल आदमी के मोह को बढ़ाते हैं और उन पर धन खर्च होता है। इसी कारण आम भारतीय धन संचय में अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है और सिवाय दुःख के उसके हाथ कुछ नहीं आता।

हालत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान की बात तो सभी करते हैं पर धारण उसे नहीं करता। पंचतत्वों से बनी इस देह को नष्ट होना है और आत्मा अमर है इसलिये मृत देह के अंतिम संस्कार और श्राद्ध जैसी परंपराओं को निभाने की प्रेरणा देना उचित नहीं है। इस देह को लेकर को नाटकबाजी करना ही अज्ञान का प्रमाण है। यहां तक कहा जा सकता है कि जन्मतिथि और पुण्य तिथि मनाना ही एक तरह से देहाभिमान का परिणाम है। जब आत्मा अमर है तो पैदा कौन हुआ मरा कौन-इस पर विचार कर देखें तो पायेंगे कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। इनसे मुक्त होकर जीवन व्यतीत करें तो शायद मानसिक संताप और वेदना स्वतः कम हो जाये।
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