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Thursday 7 May 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समय के अनुसार कछुए और सांप के अनुसार व्यवहार करें

कौमे संकोचभास्य प्रहारमपि मर्धयेत्।
काले प्रापते तु मतिमानुत्तिश्ठेत्क्रूरसर्पवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने समय के अनुसार जीवन में रणनीति बनाते हुए कछुए के समान अंग समेटकर शत्रु का प्रहार भी सहन करें तो और उचित अवसर देखकर सांप के समान प्रहार भी करें।
मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः।
अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जाता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे के शब्दिक और शारीरिक आक्रमण को झेलना पड़ता है। उस समय हमें अपनी स्थितियों और शक्ति का अवलोकन करते हुए इस बात को भी देखना चाहिये कि हमारे सहयोगी कौन है? अगर समय हमारे अनुकूल न हो तो अपनी सहनशक्ति को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि उस समय क्रोध या निराशा में उठाया गया कदम आत्मघाती होता है।
इसके विपरीत जब हमारा समय अनुकूल हो और लगता हो कि हमारे मित्र और सहयोगी साथ देने के लिये तैयार हैं और शत्रु या विरोधी को दबाया जा सकता है तब उस पर शाब्दिक या शारीरिक आक्रमण किया जा सकता है। वैसे आजकल के सभ्य युग में शारीरिक कम शाब्दिक संघर्ष अधिक होते हैं। चाहे किस प्रकार का भी आक्रमण हो उसकी तैयारी विवेक से करना चाहिये। कहीं कहीं हम पर शाब्दिक आक्रमण भी होता है और अगर लगता है कि वहंा प्रत्युत्तर देने का उचित समय नहीं है तो मौन रहना ही बेहतर है परंतु यदि लगता है कि उससे सामने वाले को अनावश्यक लाभ मिल रहा है तो स्थिति देखकर उस पर पलटवार करना बुरा नहीं है।
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Wednesday 6 May 2009

भर्तृहरि शतकः दुष्ट से दया और मित्र से धन की याचना नहीं करना चाहिए

असन्तो नाम्यथ्र्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्याच्या वृत्तिर्मलिनमुसुभंगेऽप्यसुकरं।
चिपद्युच्चैः स्थेयं पदमनृविधेयं च महतां सत्तां केनाद्दिष्टं विषमममसिधाराव्रतमिदम्?
हिंदी में भावार्थ-
दृष्ट लोगों से दया के लिये प्रार्थना और अमीर मित्रों से याचना न कर केवल सत्य आचरण से ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिये-ऐसे विचार का प्रतिपादन सज्जन लोगों के लिये किसने किया? मृत्यु के समक्ष भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महापुरुषों के मार्ग का ही अनुसरण करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन के अनेक नियम हैं जिनमें यह भी है कि जो व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का है उससे दया की याचना करने का कोई अर्थ नहीं है। उससे अपनी दुष्टता का प्रदर्शन करना ही है। दया दिखाने पर हो सकता है वह कुछ देर अपने दुष्कर्म से रुक जाये पर फिर उसे उसी मार्ग पर जाना है। अतः दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्रतिकार करने का सामर्थ्य हमेशा अपने पास रखना चाहिये या फिर उस स्थान से ही चले जाना चाहिये जहां वह निवास करते है।
उसी तरह अपने धनी मित्र से किसी प्रकार की याचना कर अपने संबंध बिगाड़ने की आशंकायें पैदा करना व्यर्थ है। धन एक माया का रूप है और वह सभी को भ्रम, लालच और लोभ की प्रवृत्तियों के कारण अपने बंधन में जकड़े रहती है। अतः अपने धन बंधु-बांधवों और मित्रों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह याचना करने पर आर्थिक सहायता देंगे। जहां तक आर्थिक सहायता का प्रश्न है तो जिसके मन में यह उदार भाव होता है वह बिना मंागे ही करता है और जिसका हृदय संकीर्ण मानसिकता वाला है उससे कितना भी आग्रह करें वह आर्थिक सहायता नहीं करेगा।
जीवन में अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिये जरूरी है कि उसके कुछ नियमों को समझाया जाये। महापुरुष द्वारा ने अपने अनुभवों से जो सत्य का मार्ग दिखाया है उस पर चलकर ही सामान्य मनुष्य जीवन में स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। उससे पृथक चलना अपने आपको ही शारीरिक और मानसिक कष्ट देना है।
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Monday 4 May 2009

मनु स्मृतिः ज्ञान होने पर युवक का भी सम्मान होता है

न हायनैर्न पालितैर्न वित्तेन न बंधुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मयोऽनुचारः स नो महान्।।
हिंदी में भावार्थ-
आयु,सफेद बाल, धन तथा अच्छे कुल होने से ज्ञान और आचरण का अधिक महत्व है। धर्म के अनुसार चलने वाले को ही समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
न तेन वृद्धो भवति वेनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाऽप्यधीयानस्तं देवाःस्थविरं विदुः।।
हिंदी में भावार्थ-
व्यक्ति के बाल सफेद होने से वह सम्मानीय नहीं हो जाता जबकि ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद युवा व्यक्ति भी समाज के सभी वर्गो में सम्मान पाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भौतिक पदार्थों और कथित रूप से समाज की परंपराओं का ज्ञान रखने वाले लोग केवल इस आधार पर सम्मान पाना चाहते हैं कि उनके बारे में वह सबसे अधिक जानते हैं। अनेक लोग आयु में बड़े, अधिक धन और अच्छे कुछ का होने के कारण सम्मान पाने का मोह पाल लेते हैं। दिखाने के लिये लोग उनका सम्मान करते भी हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान और उसके अनुरूप आचरण न होने के कारण हृदय से उनका सम्मान कोई नहीं करता।
तात्पर्य यह है कि अगर समाज में लोगों के हृदय में अपने सम्मान का भाव स्थापित करना है तो अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के साथ उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है। वैसे तो परिवार में बड़ा, समाज में धनी और अनपढ़ों में शिक्षित होने से अनेक लोगों को लोग दिखावे के लिये मान देते हैं। सामने कोई नहीं कहता कि ‘आप में न तो अध्यात्मिक ज्ञान है न आचरण’, पर मन में सभी की सोच यही होती है। जो ज्ञान रटकर दूसरों को प्रभावित करते हैं वह भी फूलते हैं पर उनका आचरण उसके अनुरूप नहीं होता और लोग पीठ पीछे उनकी निंदा करते हैं या मजाक उड़ाते हैं। सम्मान तो वह है कि पीठ पीछे भी समाज के सभी वर्ग के लोग प्रशंसा करें। यह तभी संभव है जब अपने प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान होने के साथ उसके अनुरूप आचरण भी हो।
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Sunday 3 May 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दुष्ट धनवान राज्य के लिये अग्नि के समान

आस्रावयेदुपचितान् साधु दुष्टऽव्रणनि।
आमुक्तास्ते च वतैरन् वह्मविव महीपती।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट व्रणों की तरह पके हुए धन से संपन्न असाधु पुरुष को निचोड़ लेना ही ठीक है वरना वह दुष्ट स्वभाव वाले अग्नि के समान राज्य के साथ व्यवहार कर उसे त्रस्त करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-धन कमाने के दो ही मार्ग है-एक प्राकृतिक व्यापार से और दूसरा अप्राकृतिक व्यापार। जिन लोगों के पास अप्राकृतिक व्यापार से धन आता है वह न केवल स्वयं दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं बल्कि दूसरों को भी अपराध करने के लिये उकसाते हैं। वह अवैध रूप से धन कमाने के लिये राज्य का ध्यान भटकाने के उद्देश्य से ऐसे अपराधियों को साथ रखते हैं जो उनकी इस काम में सहायता करें। अधिक धन से पके हुए ऐसे दुष्ट पुरुष राज्य के लिये आग के समान होते हैं भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से समाज का हितैषी होने का दावा करते हैं पर अप्रत्यक्ष रूप से वह असामजिक तत्वों और अपराधियों की सहायता कर पूरे राज्य में कष्ट पैदा करते हैं। वैसे आजकल तो प्राकृतिक व्यापार और अप्राकृतिक व्यापार का अंतर ही नहीं दिखाई देता क्योंकि लोग दिखावे के लिये सफेद धंधा करते हैं पर उनको काला धंधा ही शक्ति प्रदान करता है। राज्य को चाहिये कि ऐसे लोगों पर दृष्टि रखते हुए उनको निचोड़ ले।
भले राज्य के प्रसंग में बात कही गयी है पर एक आम व्यक्ति के रूप में भी ऐसे धनिकों से सतर्क रहना चाहिये जो अप्राकृतिक और काला व्यापार करते हैं। ऐसे लोग धन कमाकर अहंकार के भाव को प्राप्त हो जाते हैं। इनसे संपर्क रखना मतलब आपने लिये आफत मोल लेना है। वह अपना उद्देश्य से कभी भी उपयोग कर किसी भी व्यक्ति को संकट में डाल सकते हैं। इतना ही नहीं संबंध होने पर अगर किसी काम के लिये मना किया जाये तो वह उग्र होकर बदला भी लेते हैं। उनके लिये स्त्री हो या पुरुष पर काम निकालते हुए वह उसे केवल एक वस्तु या हथियार ही समझते हैं। अपना काम न करने पर पूरे परिवार के लिये अग्नि के समान व्यवहार करते हैं। धन देकर काम लेकर ही यह संतुष्ट नहीं होते बल्कि आदमी को अपना गुलाम समझकर उसे त्रास भी देते हैं।
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