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Friday 6 March 2009

भर्तृहरि नीति शतक:मन अगर न मिलें तो निकट व्यक्ति से भी दूरी अनुभव होती है

विरहेऽपि संगमः खलु परस्परं संगतं मनो येषाम्
हृदयमपि विघट्ठितं चित्संगी विरहं विशेषयति

हिंदी में भावार्थ-जिनके हृदय आपस में मिले हों वह विरह होने पर साथ रहने की अनुभूति करते हैं और जिनके मन न मिलते हों वह साथ भी रहें तो ऐसा लगता है कि बहुत दूर हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सारी दुनियां में प्रेम का संदेश फैलाया जाता है पर सच यह है कि प्रेम वह भाव है जो स्वाभाविक रूप से होता है। प्रेम में अगर कोई दैहिक,आर्थिक या सामाजिक स्वार्थ हो तो वह प्रेम नहीं रहता। ऐसे स्वार्थ के संबंध आदमी एक दूसरे से निभाते हैं पर उनमें आपस में हार्दिक प्रेम हो यह समझना गलत है। हमारा अध्यात्म दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रेम दो अक्षरों का सीमित अर्थ वाला शब्द नहीं है बल्कि उसका आधार व्यापक है। जो व्यक्ति एक दूसरे के प्रति निस्वार्थ भाव रखते हैं वही प्रेम करते हैं।
वैसे आजकल प्रेम का शब्द चाहे जहां सुनाई देता है पर उसका भाव कोई जानता हो यह नहीं लगता। आजकल तो प्रेम स्त्री पुरुष के दैहिक संबंधों तक ही सीमित माना जाता है। कभी प्रेम दिवस तो कभी मित्र दिवस के नाम पर युवक युवतियों की दैहिक भावनाओं को भड़काने के लिये तमाम तरह के प्रयास उनको बाजार के उत्पादों के प्रयोक्ता बनाने के लिये किये जाते हैं पर यह क्षणिक आकर्षण कभी प्रेम नहीं होता। अनेक ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं जब कथित प्रेम के आकर्षण में फंसकर युवक युवती विवाह कर लेते हैं पर बाद में घर गृहस्थी के बोझ तले दोनों एक दूसरे के लिये अपरिचित होते जाते हैं। जहां हृदय के प्रेम की बात होती थी वहां जब अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिये संघर्ष की बात आती है तो सब कुछ हवा हो जाता है। ऐसे तनाव होता है कि एक छत के नीचे रहने वाले पति पत्नी एक दूसरे के लिये दूर हो जाते हैं।
नौकरी और व्यापार में अनेक लोगों से संपर्क प्रतिदिन बनता है पर सभी मित्र या प्रेमी नहीं बन जाते। कई बार तो ऐसा होता है कि अपने परिवार के सदस्यों से अधिक अपने निकट सहकर्मियों या निकटस्थ लोगों के साथ समय व्यतीत होता है पर फिर भी वह अपने नहीं बन पाते। उनसे मानसिक दूरी बनी रहती है। इसके विपरीत परिवार के सदस्य दूर हों तो भी हृदय के निकट होते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday 5 March 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्रः कुशल राज्य प्रमुख वही है जो शत्रु को उसके शत्रु से नष्ट करने की बात जाने

रिपोः शत्रुपरिच्छेदः सहृद्वप्पुविभेनम्।
दुर्गकोषबलयानं कृत्यपक्षेपसंग्रहः।।

राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह अपने शत्रु को उसके शत्रु से विनाश की प्रक्रिया को जानने के साथ उसके सहृदयों का भेद,दुर्ग,कोष और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करते हुए अपने साथ कर्तव्य पूर्ण करने वाले सहयोगियों का संगह करे।
दूतेनैव नरेंद्रस्तु फुर्वीतारविकर्षणम्।
स्वपक्षे च विजानीयात्तपरदूतविचेष्टितम्
हिंदी में भावार्थ-राजा को चाहिये कि वह अपने दूत के द्वारा ही दूसरे राजा को आकर्षित करे और अपने शत्रु के दूत की चेष्टाओं से उसका मंतव्य समझे।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल पूरी दुनियां के सभी देश आधुनिक और तीव्रगामी हथियारों से सुज्जित हो गये हैं। ऐसे में सीधे युद्ध के बहुत सारे खतरे है। सभी देशों के पास दूर तक मार करने वाली मिसाइलें और राकेट हैं। ऐसे बम हैं कि अगर एक गिर जायें तो पूरा शहर नष्ट हो जाये। 1942 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये गये बमों की याद आते ही लोग सिहर उठते हैं जबकि उससे कई गुना शक्तिशाली बम अब बन चुके हैं। ऐसे में अब कूटनीति से काम लेने में ही बुद्धिमान लोग ठीक समझते हैं। इसलिये अब वह समय है कि जब अपने शत्रु को उसके शत्रु से नष्ट कराया जाये या उसे अपने ही देश में उलझाया जाये कि वह अपने राज्य पर वक्रदृष्टि न डाल सके। सच बात तो यह है कि कुशल राजा वही है जो अपनी प्रजा पर युद्ध लादने की बजाय अपने शत्रु को उसके राज्य में स्थित शत्रु से नष्ट करने की कूटनीतिक चाल चले। हालांकि सीधे युद्ध में जीतने पर राज्य प्रमुख का सम्मान होता है पर उसके खतरे भी बहुत हैं। कूटनीतिक चाल से शत्रु को पराजित करने में जहां अपनी प्रजा सुरक्षित होती है पर आजकल उसका प्रचार करना संभव नहीं है। अगर कूटनीति से विजय मिल भी जाये तो उसका दावा कोई सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता। इसके बावजूद यह एक सच्चाई है कि बुद्धिमान राज्य प्रमुख वही है जो कूटनीतिक चाल चलते हुए शत्रु राज्य को उसके शत्रुओं के हाथ से पराजित करे।
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Sunday 1 March 2009

भर्तृहरि शतकः कामदेव के प्रहार कौन झेल पाता है?

तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीन्त्वं विवेकता।
यावज्ज्वलति नांगेषु पंचेषु पावकः


हिंदी में भावार्थ-विद्वता,सज्जनता,कुलीनता तथा बुद्धिमानी का ज्ञान तब तक ही मनुष्य के हृदय में रहता है जब तक कामदेव का हमला उस पर नहीं होता। उसक बाद तो सभी पवित्र भाव नष्ट हो जाते है।
संपादकीय व्याख्या-समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में अनेक ऐसे समाचार आते हैं जिसमें कथित साधु संतों, धनपतियों,प्रतिष्ठित परिवारों और समाजसेवा में रत लोगों के यौन प्रकरणों की चर्चा होती है। उस समय हमारे मन में यह बात आती है कि ‘अमुक व्यक्ति तो बहुत प्रसिद्ध,ज्ञानी,कुलीन और धनी है भला वह कैसे ऐसे प्रकरण में लिप्त हो सकता है।’ सच बात तो यह है कि जब मनुष्य पर काम भावना का प्रहार होता है तब वह विपरीत लिंग के आकर्षण के जाल में ऐसा फंस जाता है कि वहां से उसका निकलना कठिन है।’
वैसे तो हमारा समाज भी यह बात मानता है कि आम आदमी को यहां किसी प्रकार की आजादी नहीं है पर बड़े आदमी को सभी प्रकार की छूट है। कहते हैं न कि ‘बड़े आदमियों को कौन कहता है। पर हम तो छोटे आदमी है इसलिये समाज को देखकर चलना पड़ता है।’ यही कारण है कि जो समाज के शिखर पर बैठे हैं पर इसकी परवाह नहीं करते कि उनके यौन प्रकरणों पर सामान्य लोग क्या कहेंगे? वैसे भी काम भावना समाज, नैतिकता और आदर्श पर चलने किसे देती है उस पर धन,प्रसिद्धि, और बाहूबल आदमी को वैसे ही मंदाध बना देता है। ऐसे में कामदेव का आक्रमण तो घुटने टेकने को बाध्य कर देता है।
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