समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

Saturday, May 9, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब से-कपटी साधुओं की तृष्णाग्नि कभी नहीं बुझती

‘जिना अंतरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।’
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार जिनके मन में कपट और विकार हैं उनकी विपत्तियां देखकर उनके साथ सहानुभूति दिखाना व्यर्थ है।
‘हिरदै जिनके कपटु बाहरहु संत कहाहि।
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।।
हिंदी में भावार्थ-
ऐसे संत जो कि बाहर ने अपने आपको धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शित करते हैं पर उनके हृदय में कपट और पाप होता है उनकी तृष्णा ओर कामनाऐं कभी शांत नहीं होती। अंत में उनको बहुत पछताना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक देव जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर ही प्रहार नहीं किये बल्कि समाज को मार्गदर्शन करने वाले कथित धार्मिक संतों-जो केवल आजीविका के लिये धार्मिक प्रतीक धारण करते हुए चोला पहन लेते हैं-की नाटकबाजी की भी आलोचना की।
यह सच है कि आम इंसान में लोभ और लालच की प्रवृत्ति होती है पर वह उसकी पूर्ति के लिये अपनी सीमा में नैतिक आधार पर कर्म करता है। इतना ही नहीं अगर उसकी इच्छाऐं और कामनायें पूरी न हों तो वह एक बार उनकी पूर्ति करने का इरादा छोड़ भी देता है क्योंकि वह अकेले होने के कारण अपने उद्ददेश्य की लिये लंबे समय तक संघर्ष नहीं कर सकता। जबकि कथित लोभी और लालची साधु की कभी तृष्णायें शांत नहीं होती फिर उनको अपनी पूज्यता, सम्मान और शक्ति का भ्रम इस कदर ढीठ बना देता है कि वह अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। उसके लिये उनको अपने ही जैसे लोभी और लालची शिष्यों का भी समर्थन मिलता है। श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणियों से यही संदेश मिलता है किं ऐसे ही कथित ढोंगी और लालची साधुओं से सतर्क रहना चाहिये जो कि इच्छा और तृष्णा की पूर्ति न होने पर एक आम आदमी से अधिक खतरनाक हो जाते हैं।
................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्द योग
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

No comments:

विशिष्ट पत्रिकायें