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Sunday, November 14, 2010

पतंजलि योग दर्शन-पांच अवस्थाओं पर नियंत्रण से इन्द्रियों पर विजय संभव

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्तवसंमादिन्द्रियजयः।।
हिन्दी में भावार्थ-ग्रहण, स्वरूप, अस्मित, अन्वय और अर्थतत्व इन पांचों अवस्थाओं में संयम करने से मन सहित इंद्रियों पर विजय प्राप्त हो जाती है।
रूपलावण्यबलवज्रसंहनत्वानि कायसम्पत्।।
हिन्दी में भावार्थ-रूप, लावण्य, बल और मानसिक दृढ़ता यानि वज्र एक संगठन होने के साथ ही शरीर की संपत्ति है।
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च।।हिन्दी में भावार्थ-इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने मन के सदृश गति, शरीर के बिना विषयों को अनुभव करने की शक्ति और प्रकृत्ति पर अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय योग साधना के प्रचारक केवल आसन तथा प्राणायाम करने के संदेश के साथ ही इसे केवल स्वस्थ रहने का उपाय बताते हैं। यह गलत नहीं है पर इससे सीमित उद्देश्य की प्राप्त होती हैं । योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान अनेक प्रकार की सिद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। अब यहां सिद्धियों का अर्थ यह कदापि नहीं लेना चाहिए कि मरे हुए आदमी को जीवित किया जा सकता है या किसी को को धन प्राप्त हो ऐसा उपाय किया जा सकता है। कुछ लोग योग साधना कर यह भ्रम पाल लेते हैं कि उनको तो भारी सिद्धियां मिल गयी। दरअसल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान करने से मनुष्य की देह तथा इंद्रियों में तीक्ष्णता आती है पर अन्य ज्ञान न होने की वजह से उसका उपयोग अनेक लोग अज्ञानजनित कार्यों में करते के साथ ही अंधविश्वास फैलाने में करते हैं।
पतंजलि महाराज ने योग दर्शन में केवल मनुष्य को स्वयं शक्तिशली और दृढ़ मानसिकता का स्वामी होने का पाठा सिखाया है। योगासन, प्राणायाम तथा मंत्र जाप के बाद जब ध्यान किया जाता है तब वह मनुष्य देह और मन को पूर्णता प्राप्त करता है। उस समय अंतर्मन का निरीक्षण करने से बाहर के विषयों की अनुभूति की जा सकती है। ऐसी जगहों को भी अनुमान किया जा सकता है जहां स्वयं उपस्थित न हों। इतना ही दूसरे व्यक्ति का चेहरा देखकर या उसके शब्द सुनकर उसके मन में चल रही अन्य बातों का भी अनुमान किया जा सकता है। इसके अलावा गर्मी, सर्दी और वर्षा के दौरान अपनी देह को बीमारियों से भी बचाया जा सकता है। जब हम स्वस्थ होते हैं तो हमारी योग्यता और प्रतिभा का प्रवाह स्वत: प्रवाहित होता है जिसे वजह से समाज में सम्मान मिलता है।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com


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Friday, November 5, 2010

पंतजलि योग दर्शन-सुख और दुःख की अनुभूति क्लेश का परिणाम (patanjali yoga shastra-dukh aur sukh ki anubhuti)

सुखानुशयी रागः।।
हिन्दी में भावार्थ-
सुख प्राप्ति की अनुभूति कराने वाला क्लेश भाव राग का है।
दुःखानुशयी द्वेष।।
हिन्दी में भावार्थ-
दुख की अनुभूति के पीछे क्लेश भाव ही द्वेष है।
दुग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवासिमता।।
हिन्दी में भावार्थ-
दृष्टा और दर्शन का एक होना ‘अस्मिता’ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन को दृष्टा भाव से जीना भी एक कला है। इस कला में महारत हासिल करने वाले योग साधन तथा ज्ञानी लोग दुःख और सुख के भाव से परे होते हैं। जब मनुष्य को सुख की अनुभूति होती है तो वह उसके अंदर विद्यमान राग के भाव की वजह से है यह समझना चाहिए। जब आदमी के अंदर दुःख की अनुभूति हो तो उसे द्वेष भाव से उत्पन्न ही माने। इन दोनों को क्लेश भाव कहा गया है। हम अगर सहज योग की विधा से अपनी देह की गतिविधियों     का अवलोकन करें तो यह दृष्टिगोचर स्वतः होगा कि जब हम नीम का पत्ता और करेला खातें है तब कड़वाहट का अनुभव होता है और मिठाई का सेवन करते हैं तब मिठास लगता है पर यह सभी प्रकार के पदार्थ चाहे मीठे हों या कड़वे देह में जाते ही दोनों कचड़े के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।
यही स्थिति दृश्य की भी है। हम आंखों से अप्रिय व्यक्ति को देखें या प्रिय को पर उनका प्रभाव एक जैसा ही है क्योंकि अंततः दृश्य अंततः तनाव का कारण बनता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि हम ग्रहण करने वाली इंद्रियों से चाहे जैसा भी ग्रहण करें निष्कासन अंगों तक आते आते उनका प्रभाव कचड़े जैसा ही होता है। इससे यूं भी कहें कि सभी प्रकार के पदार्थों का सेवन करने से जहां देह में विकार आता है वैसे ही श्रवण, दर्शन, स्पर्श तथा गंध ग्रहण करने की क्रियाओं से भी मन और विचारों में विकार आता है। इनका पूर्णरूपेण निष्कासन आवश्यक है जो योग साधना से ही संभव है। इसलिये योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप से अभ्यास करने वाले योगी अंततः दृष्टा भाव को प्राप्त हो जाते हैं। उनको राग और द्वेष से उत्पन्न होने वाला क्लेश छू भी नहीं पाता। उनको यह तत्व ज्ञान स्वतः प्राप्त हो जाता है कि इंद्रिया ही इंद्रियों में और गुण ही गुण में बरत रहे हैं। सुख में मिली प्रसन्नता हो या दुःख में प्राप्त विलाप दोनों ही विकार उत्पन्न करने वाले हैं। ऐसी सिद्धि केवल योग साधना से प्राप्त होना संभव है यह निश्चित है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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