समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label योगासन. Show all posts
Showing posts with label योगासन. Show all posts

Saturday, May 1, 2010

पतंजलि योग दर्शन-जातीय सीमाओं से मुक्त होने पर मनुष्य बन जाता है महावत (patanjali yog darshan-manushya aur jatipati)

जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।
हिन्दी में भावार्थ
-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण विचाराधाराओं से बाहर आने का संदेश दे रहे हैं। योगासन और प्राणायाम के बाद मनुष्य की देह तथा मन में स्फूर्ति आती है तब उसके हृदय में कुछ नया कर गुजरने की चाहत पैदा होती है। ऐसे में वह अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। उस समय उसे अपने मस्तिष्क की सारी खिड़कियां खुली रखना चाहिए।
हमारे देश में जाति, भाषा, वर्ण तथा क्षेत्र को लेकर संकीर्णता का भाव लोगों में बहुत देखा जाता है। सभी लोग अपने समाज की श्रेष्ठता का बखान करते हुए नहीं थकते। हमारे देश में समाज का विभाजन कर कल्याण की योजनायें बनायी जाती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से काम करने में जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय भावनाओं की प्रधानता देखती है जाती है। इस संकीर्ण सोच ने हमारे देश के लोगों को कायर और अक्षम बना दिया है। भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है क्योंकि हर आदमी अपने व्यक्तिगत दायरों में होकर सोचता है और उसे समाज से कोई सरोकार नहीं  है।
जिन लोगों को कुशल महावत की तरह अपने जिंदगी रूपी हाथी पर नियंत्रण करना है उनको अपने अंदर किसी प्रकार की संकीर्ण सोच को स्थान नहीं देना चाहिये। जब आदमी जातीय, भाषाई, वर्णिक तथा क्षेत्रीय सीमाओं के सोचता है तो उसकी चिंता अपने समाज पर ही क्रेद्रित होकर रह जाती है। तब उसे लगता है कि वह कोई ऐसा काम न करे करे जिससे उसका समाज नाराज न हो जाये। यहां तक कि इस डर से वह दूसरे समाज के लिये हित का न तो सोचता है न करता है कि वह उसके समाज का विरोधी है। इससे उसके अंदर असहजता का भाव उत्पन्न होता है। जब आदमी उन्मुक्त होकर जीवन में में विचरण करता है तब वह विभिन्न जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय समूहों में भी उसको प्रेम मिलता है जिससे उसका आनंद बढ़ जाता है।
------------
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Sunday, November 30, 2008

भृतहरि संदेशः दुष्ट को ज्ञान अहंकारी बना देता है

ज्ञानं सतां मानमदादिननाशं केषांचिदेतन्मदमानकारणम्
स्थानं विविक्त्तं यमिनां विमुक्त्तये कामातुराणामपिकामकारणम्

हिंदी में भावार्थ-संत और सज्जन पुरुषों जब ज्ञान को धारण करते हैं तो उनके मन में सम्मान का मोह और मद नष्ट हो जाता है पर वही ज्ञान दुष्टों को अहंकारी बना देता है। जिस प्रकार एकांत स्थान योगियों को साधना के लिये प्रेरित करता है वैसे कामी पुरुषों की काम भावना को बढ़ा देता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय अध्यात्म ज्ञान की यही खूबी है कि वह ज्ञानी आदमी को महाज्ञानी बना देता है पर अगर दुष्ट हो तो वह उसे अहंकारी बना देता है। शायद यही कारण है कि श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना ज्ञान केवल भक्तों में प्रचारित करने के लिये कहा है। ‘यह जीवन नश्वर है’-यह भाव जब सज्जन में आता है तब वह यही प्रयास करता है कि वह उसका सदुपयोग करते हुए उसे परोपकार,ज्ञानार्जन और दान करते बिताये पर यही ज्ञान जब किसी दुष्ट को प्राप्त हो जाये तो वह हिंसा,लूट और भोग विलास में लगा देता है यह सोचकर कि यह जीवन तो कभी न कभी नष्ट हो जायेगा।
कथित साधु संत भारतीय धर्म ग्रंथों से ज्ञान रटकर देश विदेश में घूमते हैं अपने लिये धनार्जन करते हुए वह इस बात का ध्यान नहीं करते कि इस तरह सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा नहीं की जाती। अनेक योग शिक्षक भी भारत की इस विद्या का प्रचार उन लोगों में कर रहे हैं जो भारतीय अध्यात्म ज्ञान को समझते नहीं है। सच बात तो यह है कि योगासन करने से देह में एक स्फूर्ति आती है पर अगर ज्ञान नहीं है तो कोई भी भटक सकता है। देह के साथ मन की शुद्धि के लिये मंत्रादि जपना चाहिये और विचारों की शुद्धता के लिये ध्यान करना अनिवार्य है। योग शिक्षक इसका महत्व नहीं समझते बस! शरीर को स्वस्थ रखने के लिये योगासन का प्रचार करते हैं जबकि इसके लिये यह अनिवार्य है कि साधक भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परिचित हो। जो भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परिचित नहीं है तो वह योगासन से अच्छा स्वास्थ प्राप्त कर भी कोई भला काम करे यह संभव नहीं है पर कोई बुरा काम तो कर ही सकता है। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा उन्हें ही दिया जाना चाहिये जो सज्जन हो। दुष्ट लोगों को देने से कोई लाभ नहीं क्योंकि या तो वह उसका मजाक बनाते हैं या दुरुपयोग करने के लिये तैयार हो जाते हैं।
....................................

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.‘शब्दलेख सारथी’
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

विशिष्ट पत्रिकायें