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Saturday, October 23, 2010

मनुस्मृति-शांत बैठना भी एक तरह से आसन (shant rahna bhee ek tarha se asan-manu smruti in hindi)

यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।

क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार करना  चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा ही शांत होकर अपना काम करना चाहिए।
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Sunday, October 3, 2010

मनुस्मृति-विद्यादान अत्यंत महत्वपूर्ण (hindu dharmik vichar-vidyadan ka mahatva)

सर्वेषामेव दानानो ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चगसर्मिषाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जल, अन्न, गाय, भूमि, वस्त्र, तेल, सोना घी आदि वस्तुओं के दान से अधिक महत्व विद्या दान का है।
येन यने तू भावेन सद्यद्दानं प्रयच्छति।
तत्तत्तेनैव भावेन प्राष्नोति प्रतिपूजितः।।
हिन्दी में भावार्थ-
दान देने वाला जिस भावना से देता है वैसा ही फल उसे मिलता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने मनुष्य के लिये दान की महत्ता अनेक कारणों से स्वीकार किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस संसार में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जिसके पास विवेक है इस कारण वह अपनी आवश्यकताओं से अधिक संग्रह करता है। इसी कारण कुछ मनुष्य ऐसे भी रह जाते हैं जिनकी भौतिक उपलब्धियां कम रह जाती हैं। एक संग्रह करता है तो दूसरा अभाव झेलता है। इससे समाज में वैमनस्य का भाव भी फैलता है। यही कारण है कि अधिक धनवानों को हमेशा ही दान कर समाज में अपना प्रभाव बढ़ाने के साथ ही अध्यात्मिक शांति के साथ जीवन व्यतीत करने की राय दी जाती है। दूसरी बात यह है कि मनुष्य के अलावा अन्य समस्त जीवों में विवेक की सीमा होती है। न वह संग्रह करते हैं न शोषण करते हैं न उनके पास दान करने योग्य वस्तु न लेने की चाहत। अपनी उदरपूर्ति के अलावा उनके अन्य कार्य शेष नहीं रह जाता। ऐसे में मनुष्य की अलग पहचान केवल दान करने से ही बनती है।
अपने तथा परिवार का भरण भोषण तो सभी जीव करते हैं ऐसे में अगर मनुष्य होकर भी यही किया तो कौनसा तीर मार लिया। मनुष्य की श्रेष्ठता तो इसी में ही है कि वह दूसरे जीवों की सहायत के लिये हृदय से काम करे। वस्तुओं के दान से भी अधिक है दूसरे को विद्या और ज्ञान देना। इसीलिये आज के संदर्भ में उसका भी बहुत महत्व है। अनेक लोगों ने नयी नयी तकनीकी का ज्ञान प्राप्त किया है। उनको चाहिए कि वह ऐसे मनुष्यों को उससे अवगत करायें जो उसे नहीं जानते।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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