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Saturday, September 5, 2009

श्रीगीता से-ज्ञानी लोग वेद पढ़ने के पुण्य का उल्लंघन कर जाते हैं (shri geeta-gyani log aur ved)

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदावादरताः पार्थ नान्यदरस्तीति वादिनः।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।
भोगैश्वर्यप्रस्कतानां तयापहृतचेसाम्।।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।
(श्री गीता के अध्याय दो के श्लोक क्र. 42, 43, 44)
हिंदी में भावार्थ-जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है जो कहते हैं कि स्वर्ग से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकार दिखावटी आकर्षक वाणी कहते हैं, जो मनुष्य जन्म रूप कर्मफल देने वाले भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं और वाणी द्वारा जिनका चित हर लिया गया है, जिनकी बुद्धि भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति के व्यवसाय में आसक्त है उनकी परमात्मा में निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रविष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।
(श्री गीता के अध्याय 8 का श्लोक क्रमांक 28)
हिंदी में भावार्थ-योगी पुरुष ज्ञान रहस्य के तत्व को जानकर वेदों को पढ़ने तथा यज्ञ, तप दानादि के करने में पुण्यफल कहा है उन सबका निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार भी है। अगर हम श्रीगीता के उपरोक्त श्लोकों को देखें तो उनसे यही आशय निकलता है कि भगवान श्रीकृष्ण जी ने वेदों में स्वर्ग दिलाने वाले कर्मकांडों को महत्व न देते हुए केवल उनमें ही लिप्त रहने को अज्ञान का प्रमाण माना है। हालांकि श्रीगीता में अनेक स्थानों पर वेदों की चर्चा है पर स्वर्ग के लिये कर्मकांडों में मनुष्य को लिप्त करने वाले उनके संदेशों को एक तरह से भगवान श्री कृष्ण ने द्वारा खारिज किया गया है।
दूसरे शब्दों में कहें तो भगवान श्रीकृष्ण जी ने इन पवित्र वेदों से तत्वज्ञान के साथ जीवन एवं सुष्टि रहस्यों का सार लेकर अपने गीता संदेश में प्रस्तुत किया और स्वर्ग के प्रयासों सकाम भक्ति मान लिया। यही कारण है कि उनके द्वारा निष्काम भक्ति तथा निष्प्रयोजन दया के सिद्धांत का प्रतिपादन करने से समाज में वेदों से अधिक श्रीगीता का महत्व बढ़ गया। यहां याद रहे वेदों में सभी प्रकार की भक्ति की बात कही गयी है। यही कारण है कि समाज में बहुदेव वादी संस्कृति और पूजा पद्धतियों का निर्माण हुआ। अपने समय में वेदों का बहुत महत्व रहा है पर श्रीगीता की स्थापना के बाद उनकी सहायक भूमिका ही रह गयी। अक्सर वेदों को लेकर देश के ही कुछ कथित विद्वान अपने ही धर्म की आलोचना करते हैं पर उनको पता ही नहीं कि श्रीगीता में ही अब भारतीय अध्यात्म में मूल तत्व विराजमान हैं।
भगवान श्रीकृष्ण समाज में धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलने की प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे और इसलिये उन्होंने श्रीगीता की स्थापना की। उसमें केवल अध्यात्मिक शांति के लिये तत्वज्ञान ही नहीं है बल्कि दैहिक रूप से मनुष्य अपना जीवन स्वस्थ और प्रसन्नचित होकर गुजारे इसके लिये विज्ञान रहस्य भी उसमें शामिल है। अक्सर अनेक लोग आलोचकों के प्रतिकार के लिये वेदों की प्रशंसा कर अपना समय नष्ट करते हैं उनको इस बात का आभास ही नहीं है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक स्थानों पर वेदों के ज्ञान को अस्वीकार किया है। दरअसल हमारा समाज सतत चलता रहता है और उसमें रूढ़ता की प्रवृत्ति नहीं है इसलिये वेदों से निकले ज्ञान को अनेक महापुरुष अपने उन वचनों और रचनाओं में स्थान देते रहे हैं जो हमेशा ही समाज के लिये हितकर हैं और समाज भी उनको ग्रहण करता रहा है। श्रीगीता की स्थापना ने भारतीय समाज को न केवल अध्यात्मिक रूप से दृढ़ता प्रदान की बल्कि सांसरिक कार्यों को संपन्न करने का संबल भी प्रदान किया। यही कारण है कि आज समाज में लोग वेदों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि श्रीगीता के साथ ही बाल्मीकी रामायण तथा श्रीमद्भागवत भी हृदय को प्रसन्न करने वाले ग्रंथ हैं। मजे की बात यह है कि भारतीय धर्मों के आलोचक वेदों से तो श्लोक उठाते हैं पर इन ग्रंथों में कुछ ढूंढने से कतराते हैं क्योंकि उनको अपने ही हृदय परिवर्तन की आशंका रहती है।
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