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Sunday, July 20, 2014

समाधि में सत्य का अनुभव होता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिन्तन लेख (a hindu hindi religion though based on samadhipad related by patanjali yoga literature and schince)



    भारतीय योग विद्या एक ऐसा विज्ञान है जिसका अभी पूर्ण  विशद अध्ययन किया जाना आवश्यक है। हमारी देह एक है पर उसमें तमाम तरह की हड्डियां और नसें आपस में जुडी हैं  जो उसे धारण करने के साथ ही  संचालित भी करती है। देह को चलाने के लिये बुद्धि के साथ मन भी सक्रिय रहता हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि इन सबको धारण करने वाला अदृश्य पुरुष या आत्मा है जो हम स्वयं होते हैं।  योगासन तथा प्राणायाम के बाद जब देह के साथ ही मन विकार रहित हो जाता है तब ध्यान के माध्यम से हम उस परम पुरुष के साथ अपने अंदर साक्षात्कार कर सकते हैं। जब उससे साक्षात्कार होता है तब  पता लगता है कि वह हम स्वयं हैं।  इसके बाद यह आभास होता है कि हमारी बुद्धि और मन प्रथक विषय हैं जिनकी चंचलता के गुण की समझ आने पर जीवन में भटकाव से बचा जा सकता है।  हमारा मन ही हमारी देह का संचालन कर रहा है। इस  तत्व ज्ञान में ध्यान के माध्यम से स्थित होना ही समाधि का सर्वोत्म रूप है। जब किसी साधक को इस तरह की समाधि लगाने का अभ्यास हो जाता है तब वह अपने हृदय के सांसरिक भावों पर नियंत्रण कर लेता है। वह एक दृष्टा के रूप में जीवन में देह को सक्रिय रखते  हुए भी अपने अंदर कर्ता का अहंकार नहीं आने देता।
पतंजलि योग विज्ञान में कहा गया है कि
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सत्तवपुरुषमान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च।।
     हिन्दी मे भावार्थ-बुद्धि और आत्मा के भिन्न होने की अनुभूति का ज्ञान जब समाधि में होता है तब योगी का सभी भावों पर नियंत्रण हो जाता है। वह सर्वज्ञ हो जाता है।
          हमारे देश में भारतीय योग संस्थान से जुड़े अनेक विद्वान शिविरों में जिस तरह से भारतीय योग विज्ञान का  प्रचार कर रहें हैं वह एकदम व्यावहारिक लगता है, पर देखा यह जा  रहा है कि कुछ व्यवसायिक योग शिक्षक अपने आपको ज्ञानी के रूप मे प्रस्तुत कर अध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रतिष्ठित होकर समाज में योग को लेख भ्रम फैला रहे हैं। हमें उन पर कोई टिप्पणी नहीं करनी मगर सच यह है उनका लक्ष्य केवल अपने व्यवसायिक हित साधना है| पतंजलि योग साहित्य के आठों भागों का वह सैद्धांतिक आशय पक्ष जानते हैं पर व्यावहारिक अभ्यास का उनको अनुभव नहीं है। हमारा उद्देश्य तो केवल  यह बताना है कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करने से हमें देह, बुद्धि और मन के शुद्धता की अनुभूति तो होती है पर उसके बाद अपने  दैनिक कार्य करने के दौरान अपने समय का  उचित ढंग से उपयोग  करने का ज्ञान नहीं रहता।  इसके लिये यह जरूरी है कि पतंजलि योग विज्ञान  के आठों भागों का अध्ययन करने के साथ ही समय मिलने पर श्रीमद्भागवत गीता का भी अध्ययन करना चाहिये।  योग विद्या में पारंगत होने के बाद सत्संग में शामिल होने के साथ ही अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन भी अवश्य करें ताकि जिंदगी बुद्धिमानी से गुजरे न कि पेशेवर लोग हमें अध्यात्म के नाम पर बुद्धू  बनायें।
      इस लेख का उद्देश्य आत्मप्रचार नहीं वरन भारतीय योग संस्थान के तत्वावधान में  समय समय पर आयोजित किये गए  शिविरों  योगाभ्यास  तथा वहाँ ख्याति प्राप्त विद्वानों के उद्बोधन से प्राप्त ज्ञान तथां अनुभव को बाटना है| पवित्र संकल्प लेकर योगाभ्यास करने वाले साधकों के संपर्क में आने पर जिस तरह का सुखद अहसास  होता है उसको शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता पर भारतीय योग विद्या के महान प्रभाव का वर्णन किये बिना नहीं रहा सकता|
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, July 5, 2014

बाल सफेद होने के बावजूद आदमी अज्ञानी रहता है-संत कबीर संदेश(bal safed hone ke bavjood aadmi agyani rahata hai-sant kabir sandesh)



   हमारे देश भारत में जैसे जैसे आर्थिक विकास बढ़ता गया है वैसे ही लोगों में धार्मिक प्रवृत्ति के प्रति अधिक रुझान भी देखा जा रहा है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले न केवल लोगों से चंदा और दान लेते हैं वरन् अपने ज्ञान सुनाने के लिये आधुनिक महंगे तथा अत्यंत तकनीकी साधनों का भरपूर उपयोग भी करते हैं।  सबसे बड़ा ज्ञानी वही है जिसके पास धन है। सबसे प्रभावशाली वह माना जाता है जिसके चरण कमल उच्च पद पर स्थित हैं।  सबसे शक्तिशाली वही है जो अपने बाहुबल का उपयोग कमजोर को दबाने के लिये करता है।  कभी कभी तो यह लगता है कि आधुनिक सभ्यता में शीर्ष पर पहुंचे लोग भौतिक रूप से तो जितने शक्तिशाली हो गये हैं उतने ही मानसिक रूप से कमजोर हुए हैं।  उनका पूरा श्रम, समय तथा चिंत्तन अपनी स्थिति बनाये रखने तक ही सिमट गया है।  यही कारण है कि सामाजिक रूप से बदलाव की बातें सभी करते हैं पर उनके शब्द महत्वहीन ही रहते हैं। यह शक्तिशीली शीर्ष पुरुष समाज के हित का दिखावा केवल इसलिये करते हैं ताकि उनके विरुद्ध लोगों में मन वैमनस्य का भाव बढ़ न जाये।

संत कबीर दास ने कहा है कि
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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दान कर अपने मन में प्रसन्न होते हुए फिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्ग में ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।

आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द दूर ही  रह जाते हैं और सिर के बाल  सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है  साथ ही माया के जाल में फंसा रहता है।

      हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, June 12, 2014

अधिक भोजन करना ठीक नहीं मनु स्मृति पर आधारित चिन्तन लेख (ADHIK BHOJAN KARNA THEEK NAHIN-a HINDU HINDI RELIGION THOUGHT BASED ON MANU SMRITI)



            मनुष्य भोजन, आवास तथा वस्त्र प्राप्त करने के बाद भी संग्रह करता है जबकि पशु पक्षी तथा अन्य जीव अपनी आवश्यकता पूरी होने पर शांत होकर विश्राम करते हैं। मनुष्य जहां के मन की भूख कभी शांत नहीं होती। इतना ही नहीं जब माया का प्रभाव उस पर बढ़ जाये तो वह भोजन तक आराम से नहीं करता।  कहा जाता है कि जब भोजन करें तो मन शांत रखें पर मनुष्य खुशी हो या दुःख अपने मन के भावों को भोजन के वक्त भी जाग्रत रखता है।  आमतौर से ज्ञान तािा योग साधक भोजन को औषधि की तरह ग्रहण करते हैं पर सामान्य मनुष्य भोजन के पेट भरने के साथ जीभ के स्वाद की तृप्ति भी करना चाहते हैं। आजकल तो जीभ के स्वाद के लिये ऐसे पदार्थों को उदरस्थ कर रहे हैं जो न केवल अपाचक हैं वरन् स्वास्थ के लिये हानिकारक भी होते हैं।

मनु स्मृति में कहा गया है कि

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पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सन्।
दृष्टया हृध्येत्प्रसींदेच्च प्रतिनदेच्य सर्वेशः।


     हिंदी में भावार्थ-थाली में सजकर जैसा भी भोजन प्राप्त हो उसे देखकर अपने मन में प्रसन्नता का भाव लाना चाहिये। ऐसा अच्छा भोजन हमेशा प्राप्त हो यह कामना हृदय में करना चाहिए।

अनारोगयमन्तयुरूयमस्वगर्यं चारिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्त्परिर्जयेत्।।


     हिंदी में भावार्थ- भूख से अधिक भोजन करने से  देह के लिये अस्वास्थ्यकर है। इससे आयु कम होने के साथ ही पुण्य का भी नाश होता है। दूसरे लोग अधिक खाने वाले की निंदा करते या मजाक उड़ाते हैं।
     जब सामने थाली में भोजन आता है तो उसे देखकर हमारे मन में कोई न कोई भाव अवश्य आता है। सब्जी मनपंसद हो तो अच्छा लगता है और न हो तो निराशा घेर लेती है। भोजन पसंद का न होने पर परोसने वाला कोई बाहर का आदमी हो तो हम उससे कुछ नहीं कहते पर मन में उपजा वितृष्णा का भाव उस भोजन से मिलने वाले अमृत को विष तो बना ही देता है। घर का आदमी या पुरुष हो तो हम उसे डांटफटकार देते हैं और इससे उसी भोजन को विषप्रद बना देते हैं जो अमृत देने वाला होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मन के भावों से भोजन से मिलने वाली ऊर्जा का स्वरूप निर्धारित होता है।
     भोजन खाते समय केवल उसी पर ध्यान रखना चाहिये। न तो उस समय किसी से बात करना चाहिये और न ही मन में अन्य विचार लाना चाहिये। इससे भोजन सुपाच्य हो जाता है। चिकित्साविज्ञान ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भोजन करते समय तनाव रहित व्यक्ति विकार रहित भी हो जाते हैं।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, June 4, 2014

धन की उष्णता के अभाव में आदमी उत्साहहीन हो जाता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन (dhan ke abhav aadmi utsahrahit ho jaata hai-A hindi hindu religion message based on bhartrihari policiy century)



      मनुष्य समुदाय इस धरतीपर सदियों से सांस ले रहा है। यह मानना गलत है कि उसके मूल स्वमभाव में कोई अधिक अंतर आया है। जिस तरत अन्य जीवों-पक्षू, पक्षियों तथा जलचरों का मूल स्वभाव नहीं  बदला उसी तरह मनुष्य के रहन सहन तथा खान पान की आदतें भले ही बदली हों पर उसके विचार, चिंत्तन तथा व्यवहार में कोई अंतर न आया है न आयेगा। हम अगर अपने पौराणिक ग्रथों का अध्ययन करने तो इस बात का आभास होता है कि मनुष्य समाज आज भी वैसा ही है जैसा पहले था।  इसलिये ही उनमें व्याप्त संदेश आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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यसयास्ति वित्तं स नरः कुलीन स पण्डित स श्रुतवान्गुणज्ञः।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः।

सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।


     हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य के पास माया का भंडार उसे ही कुलीन, ज्ञानी, गुणवान माना जाता है। वही आकर्षक है। स्पष्टतः सभी के गुणों का आंकलन उसके धन के आधार पर किया जाता है।

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव।

अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।

     हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर में रहित हो जाता है तब उसकी स्थिति बदल जाती  है। इस धन की बहुत विचित्र महिमा है।

     यह समाज भर्तृहरि महाराज के समय में भी था और आज भी है। हम बेकार में परेशान होकर कहते हैं कि आजकल का जमाना खराब हो गया है।सच बात तो यह है कि सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियां ही ऐसी है कि वह केवल भौतिक उपलब्धियां देखकर ही दूसरे के गुणों का आंकलन  करता है। इधर गुणवान मनुष्य अपने अंदर गुणों का संचय करते हुए इतना ज्ञानी हो जाता है कि वह इस बात को समझ लेता है कि धन से नहीं वरन गुणों से  ही उसके जीवन की रक्षा होगी। इसलिये वह समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये कोई अधिक प्रयास नहीं करता। उधर अल्पज्ञानी और ढोंगी लोग थोड़ा पढ़लिखकर सामान्य व्यक्तियों के सामने अपनी चालाकियों के सहारे उन्हीं से धन वसूल कर प्रतिष्ठित भी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इतिहास हमेशा ही उन्हीं महान लोगों को अपने पन्नों में दर्ज करता है जिन्होंने अपने गुणों से वास्तव में समाज को प्रभावित किया जाता है।
      इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हमारे पास अधिक धन नहीं है तो इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए। समाज के सामान्य लोगों की संकीर्ण मानसिकता का विचार करके अपने सम्मान और असम्मान की उपेक्षा कर देना चाहिए।  जिसके पास धन है उसे सभी मानेंगे। आप अच्छे लेखक, कवि, चित्रकार या कलाकार हैं पर उसकी अगर भौतिक उपलब्धि नहीं होती तो फिर सम्मान की आशा न करें। इतना ही नहीं अगर आप परोपकार के काम में लगे हैं तब भी यह आशा न करें  कि बिना दिखावे अथवा विज्ञापन के आपको कोई सम्मान करेगा। सम्मान या असम्मान से उपेक्षा करने के बाद आपके अंदर एक आत्मविश्वास पैदा होगा जिससे जीवन में अधिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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