समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

Tuesday 7 July 2009

संत कबीर वाणी-मांस का भक्षण मनुष्य के लिये नहीं (Kabir ke dohe)

यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय।
मुख में आमिष मेलहिं, नरक पड़े सो जाये।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांस तो श्वान का भोजन है फिर मनुष्य की देह पाकर उसे क्यों खाये। यह जानते हुए भी जो मांस खायेगा वह नरक में जायेगा।
मांस मछलियां खात है, सुरा पान सों हेत।
ते नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी का खेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य मांस और मछली खाना और शराब पीना पसंद करते हैं वह नराधम मूली के खेत के समान है जो जड़ से नष्ट हो जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस तरह समाज में मांस और मदिरा के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है वैसे ही अपराध और ठगी का पैमाना भी बढ़ा है। पहले तो यह स्थिति थी कि शराब पीने वाले को समाज में हेय और निकृष्ट समझा जाता था पर आज यह हालत है कि जो शराब या मांस का सेवन नहीं करता उसे पिछड़ा समझा जाता है। कहने को तो देश बहुत संस्कृतिनिष्ठ है पर अब परंपरागत कार्यक्रमों में शराब का सेवन खुलकर किया जाता है। कई बार तो यह देखा गया है कि शादी विवाह या अन्य अवसर पर आयोजित घरेलू धार्मिक कार्यक्रमों लोग शराब पीकर शामिल होते हैं। शराब के इस सेवन से लोगों की मानसिकता विकृत हो गयी है और हम भले ही यह दावा करते हैं कि हमारा देश धर्मनिष्ठ और संस्कृतिनिष्ठ है पर वास्तविकता यह है कि हम अपनी राह से भटक गये हैं। सच बात तो यह है कि अब हमें आत्ममंथन करना चाहिये कि हमारे अपने ही दावों में कितना दम है।
.................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday 5 July 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जीवन में कभी आलस्य न करें (kautilya ka arthshastra)

भोक्तं पुरुषकारेण दृष्टसित्रयमिव वियम्।
व्यवसायं सदैवेच्छेन्न हि कलीववदाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट स्त्री के समान धन पाने की इच्छा यानि लक्ष्मी को पुरस्कार से भोगने के लिये सदा उद्योग करते रहें। कभी आलस्य न करें।
प्रयत्नप्रेर्यर्वमणेन महता चितहस्तिना।
रूढ़वैरिद्रु मोत्खतमकृत्देव कुतः सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चित्त रूपी हाथी को अपने नियंत्रण में करने के प्रयास के साथ ही वैर रूपी वृक्ष को उखाउ़ फैंके बिना भला सुख कहां प्राप्त हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह सच है कि जीवन में मानसिक शांति के लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है पर दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सांसरिक दायित्वों के निर्वहन के लिये धन की आवश्यकता होती है। इसकी प्राप्ति के लिये भी उद्योग करना चाहिये। कभी जीवन में आलस्य न करें। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि अपने सांसरिक कर्म करते हुए भक्ति करने के साथ ही ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करें। निष्काम कर्म का श्रीगीता में आशय अक्सर गलत बताया जाता है। सच तो यह है उसमें धन की उपलिब्धयों को फल नहीं माना गया बल्कि उनसे तो सांसरिक कार्य का ही हिस्सा कहा जाता है। अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त होता है उससे हम दूसरे दायित्वों का निर्वहन करते हैं। वह अपने साथ नहीं ले जाते इसलिये उसे फल नहीं मानना चाहिये। सांसरिक कार्य के लिये धन जरूरी है और उसी से ही दान और यज्ञ भी किये जाते हैं।

इसके अलावा अपने मन में दूसरे की भौतिक उपलब्धियां देखकर निराशा या बैर नहीं पालना चाहिये। हमारे मानसिक दुःख का कारण यही है कि हम दूसरों के प्रति अनावश्यक रूप से द्वेष और बैर पाल लेते हैं। उनसे अगर विरक्त हो जायें तो आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो जाये।
..................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday 4 July 2009

संत कबीर वाणी-गाली का जवाब न देने वाला संत (kabir ke dohe)

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कहैं कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब गाली आती है तो एक ही होती है पर उसका जवाब देने पर उसकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर कोई मूर्ख आदमी गाली बकता है तो बुद्धिमान का काम है कि वह चुप हो जाये तो एक ही गाली होकर रह जायेगी।
गारी ही से ऊपजै,कलह कष्ट और मीच।
हारि चले जो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गालियां बकने से ही कलह और कष्ट पैदा होता है। गाली सुनकर जो उसका जवाब न दे वह संत और जो लड़ मरे वह नीच है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-गालियां देना एक तरह से फैशन हो गया है। अपढ़ या गंवार ही नहीं बल्कि जिनको शिक्षित और सभ्य समझा जाता है वह लोग भी आपसी बातचीत में गालियों का प्रयोग करते हैं। कई बार तो वार्तालाप के दौरान ही लोग अनावश्यक रूप से गालियां प्रयोग करते हुए इस बात का उनको आभास तक नहीं होता कि उससे उनका पूरा वाक्य अर्थहीन हो जाता है। श्रोता का दिमाग गाली सुनकर उसी पर केंद्रित हो जाने के कारण वाक्य के अन्य शब्दों का अर्थ समझने में असमर्थ रहता है या उनका उसकी दृष्टि में महत्व कम हो जाता है।
इसके अलावा अधिकतर वाद विवाद हिंसा में इसलिये ही बदल जाते हैं कि गालियों का प्रयोग प्रारंभ होने से दोनों पक्ष अपना संयम खो बैठते हैं। अगर एक आदमी गाली देता है तो उसके प्रत्तयुत्तर में दूसरा भी गाली देता है और इस तरह उनकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर गाली का जवाब नही दिया जाये तो वह एक ही होकर रह जाती है। गाली देने वाला मूर्ख और उसे सुनकर जवाब न देने वाला संत ही कहा जाता है।
........................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday 3 July 2009

भर्तृहरि शतक-विद्वान की होती है दो प्रकार की गति

संसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानां तत्वज्ञानामृताम्भः प्लवललितयां वातु कालः कदाचित्।
नो चेन्मुग्धांनानां स्तनजघनघना भोगसम्भोगिनीनां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यतानाम्।।
हिंदी में भावार्थ-
इस परिवर्तनशील दुनियां में विद्वानो की दो ही गतियां होती हैं। एक तो वह तत्वज्ञान का अमृत रसपात करें या सुंदर स्त्रियों की संगत करते हुए जीवन के समय का सदुपयोग करे।
आवासः क्रियतां गंगे पापहारिणी वारिणि।
स्तनद्वये तरुण्या वा मनोहारिणी हारिणी।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य या तो पापनाशिनी गंगा के तट पर कुटिया बनाकर रहे या फिर मोतियों की माला धारण किए हृदय में उमंग पैदा करने वाली तरुणियों की संगत करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ आधुनिक विद्वान समलैंगिकता के प्रवर्तक बन रहे हैं। उनका कहना है कि समलैंगिकता कोई बुरी बात नहीं है। हो सकता है कि उनकी राय अपनी जगह सही हो पर हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि विद्वान और समझदार आदमी की दो ही गतियां हैं। एक तो यह कि वह तत्वज्ञान का रस लेकर जीवन व्यतीत करे और दृष्टा बनकर इस संसार की गतिविधियों में शामिल होे। दूसरा यह है कि वह सुंदर स्त्री ं के साथ आनंद जीवन व्यतीत करे। यही बात हम स्त्रियेां के बारे में भी कह सकते हैं। जो लोग दावा करते हैं कि वह अधिक शिक्षित हैं और उन्हें पुरानी पंरपरायें बांध नहीं सकती हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिये कि समलैंगिकता कोई प्राकृतिक संबंध नहीं है। अरे, मनुष्य तो सभी जीवों में समझदार माना जाता है फिर भी वह ऐसे नियमों पर कैसे चल सकता है जिस पर पशु पक्षी भी नहीं चलते।
कभी आप अपने घर में देखें तो अनेक बार चिड़िया और चिड़ा जोड़े के के रूप में साथ आकर अपने लिये तिनके लाते हुए घर बनाते हैं कभी दो चिड़े या दो चिड़िया अपना युगल बनाकर यह काम नहीं करते। अगर हम कहें कि प्राकृतिक के सबसे अधिक निकट भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान हैं और इसलिये इसे यह देश विश्व में अध्यात्मिक गुरु माना जाता है तो गलत नहीं है। प्राचीन भारतीय साहित्य में जिस कार्य का उल्लेख तक नहीं है उसे प्राकृतिक तो माना ही नहीं जा सकता। यहां मनुष्य के लिये दो ही गतियां हैं एक तो यह कि वह तत्वज्ञान का रस पान करे या विपरीत लिंग वाले मनुष्य के साथ रास लीला।
................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग सारथी-पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday 1 July 2009

मनु स्मृति-खीर, रबड़ी और मालपुआ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।

वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससे बनने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
...........................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग सारथी-पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

विशिष्ट पत्रिकायें

आप इस ब्लॉग की कापी नहीं कर सकते

Text selection Lock by Hindi Blog Tips